जलप्रकल्पों पर फडणवीस की सलाह: जमीन-परमिशन पहले, बिजली खर्च घटे, ट्रीटेड पानी के खरीदार तय हों
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वर्ल्ड बैंक और आयएफसी के प्रतिनिधिमंडल के साथ समीक्षा बैठक में जलप्रकल्पों को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए सलाह दी।
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मुंबई में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि जल परियोजनाओं को आर्थिक तौर पर टिकाऊ और लंबे वक्त तक चलने लायक बनाना है तो कुछ चीजें पहले से तय होनी चाहिए। परियोजना के लिए जरूरी जमीन, रास्ते का अधिकार (राइट ऑफ वे) और बाकी परमिशन पहले से मौजूद हों। बिजली का खर्च घटाने के लिए सौर ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीक अपनाई जाए। साथ ही प्रक्रिया किए हुए गंदे पानी का इस्तेमाल करने वाले ग्राहक पहले से तय किए जाएं, ताकि परियोजनाएं आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें।
यह बात उन्होंने मुख्यमंत्री के सरकारी निवास पर हुई समीक्षा बैठक में कही। बैठक विश्व बैंक (वर्ल्ड बैंक) और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई और इसकी अध्यक्षता फडणवीस ने की। चर्चा महाराष्ट्र के शहरी बुनियादी ढांचे और जल परियोजनाओं पर थी। इसमें परियोजनाओं के क्रियान्वयन, वित्त पोषण, तकनीकी उपाय और तय समय सीमा में काम पूरा करने के मुद्दे उठे।
वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधिमंडल में दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय निदेशक मारा वॉर्विक, भारत के जल क्षेत्र प्रबंधक विल्यम रेक्स शामिल थे। आईएफसी की तरफ से दक्षिण एशिया विभाग में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के प्रबंधक नुरू लामा मौजूद थे। इनके साथ हर्ष गोयल, नीरज गुप्ता, ललिता श्रीनिवास और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी भी आए थे।
फडणवीस ने कहा कि वर्ल्ड बैंक के साथ सहयोग सिर्फ पैसों की मदद तक सीमित नहीं है। संस्थागत और व्यवस्था के स्तर पर बदलाव लाने में भी यह अहम है। आधुनिक तकनीक, बेहतर कार्यप्रणाली और आने वाली पीढ़ियों के काम आने वाली व्यवस्था खड़ी करने में बैंक का योगदान बड़ा है। राज्य पहले भी कई क्षेत्रों में बैंक के साथ काम कर चुका है और आगे यह सहयोग और बढ़ाने की जरूरत है, ऐसा उन्होंने कहा।
देरी के बारे में मुख्यमंत्री ने बताया कि कई बार परियोजना मंजूर हो जाती है, लेकिन जमीन न मिलने या दूसरी अड़चनों की वजह से काम शुरू होने में एक से दो साल की देरी हो जाती है। इसलिए वित्त पोषण के लिए जो परियोजनाएं चुनी जाएं, वे असल निवेश के लिए पूरी तरह तैयार हों। उन्होंने कहा कि छोटे शहरों में भी ऐसी सुविधाओं की बड़ी जरूरत है। मौजूद संसाधनों का मिलाकर इस्तेमाल हो और अलग-अलग संस्थाओं में तालमेल रहे, तो वित्त पोषण का खर्च घटाया जा सकता है। तब परियोजनाएं आर्थिक रूप से मजबूत और लंबे वक्त तक चलने वाली होंगी।
बिजली खर्च पर फडणवीस ने कहा कि जल परियोजनाओं के रोज के संचालन में यह बड़ा हिस्सा है। कई परियोजनाओं में तकनीकी खामी की वजह से नहीं, बल्कि बिजली बिल भरना भारी पड़ने से काम अटकता है। इसलिए नियोजन के स्तर से ही संचालन खर्च का हिसाब लगाना जरूरी है। सौर ऊर्जा परियोजना, बैटरी स्टोरेज और मौजूद आधुनिक तकनीक से बिजली खर्च घटाने पर जोर दिया जाए। इससे परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता बढ़ेगी और वे लंबे समय तक चल सकेंगी।
गंदे पानी पर प्रक्रिया के बाद मिलने वाले पानी का असरदार दोबारा इस्तेमाल भी उतना ही जरूरी है, ऐसा मुख्यमंत्री ने कहा। इस पानी को इस्तेमाल करने वाले औद्योगिक और दूसरे ग्राहक तय करना परियोजना के नियोजन का ही हिस्सा होना चाहिए। इससे पानी की मांग बनेगी, दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा और निवेश का कुछ हिस्सा वापस पाना संभव होगा। प्रक्रिया किया हुआ पानी औद्योगिक क्षेत्रों और बिजली बनाने वाली परियोजनाओं को देने के लिए पहले नीतियां बन चुकी हैं। उन्होंने कहा कि इन नीतियों के अमल में ताजा सुधार करके दोबारा इस्तेमाल बढ़ाने के लिए जरूरी व्यवस्था खड़ी की जाए।
बैठक में पेश की गई परियोजनाओं की समय सीमा महत्वाकांक्षी है, फिर भी सही नियोजन और तालमेल से उसे हासिल किया जा सकता है, ऐसा फडणवीस ने कहा। उन्होंने सभी संबंधित एजेंसियों से कहा कि तय समय सीमा के हिसाब से काम करके परियोजनाएं जल्दी लागू करें। पहले नियोजित परियोजनाओं को असरदार तरीके से चलाया जाए और फिर ऐसी परियोजनाओं का विस्तार बड़े स्तर पर हो, यह अपेक्षा उन्होंने जताई।
बैठक में मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल, महाराष्ट्र इन्स्टिट्यूशन फॉर ट्रान्सफॉर्मेशन (मित्रा) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रवीण परदेशी, नगरविकास विभाग के प्रधान सचिव नवीन सोना, वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव विकास चंद्र रस्तोगी और नगरविकास सचिव के. गोविंदराज सहित संबंधित वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
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