इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व भाजपा नेता बबलू राय की दोषसिद्धि पर लगाई रोक
हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा भुगत रहे नंदलाल राय उर्फ बबलू राय को हाईकोर्ट से राहत मिली है।
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लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व भाजपा नेता नंदलाल राय उर्फ बबलू राय की दोषसिद्धि पर रोक लगा दी है। राय एक हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा भुगत रहे थे। यह मामला पार्टी कार्यकर्ता प्रमोद कुमार निगम और 'राम जन्मभूमि' आंदोलन से जुड़े एक कार्यकर्ता की हत्या का है।
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि नेताओं का अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के प्रति एक खास फर्ज होता है। अगर दोषसिद्धि पर रोक न लगे, तो संबंधित व्यक्ति को चुनाव लड़ने का मौका गंवाना पड़ सकता है। इसी बात को देखते हुए कोर्ट ने राय की दोषसिद्धि पर रोक का आदेश दिया।
राय ने हाईकोर्ट में जमानत और दोषसिद्धि पर रोक की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी। याचिका में उन्होंने लिखा था कि वे आने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर या निर्दलीय लड़ना चाहते हैं। उनके साथ इसी मामले में आरोपी शेषनाथ शर्मा ने भी याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने उन्हें भी राहत दी है।
यह हत्या जनवरी 2017 में वाराणसी के सिग्रा इलाके में हुई थी। प्रमोद कुमार निगम को गोली मारी गई थी। वाराणसी की अदालत ने पिछले साल 15 अप्रैल को नंदलाल राय और शेषनाथ शर्मा को दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोनों ने इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की थी।
जस्टिस सिद्धार्थ और विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने 5 अक्टूबर को याचिकाओं पर आदेश दिया। जमानत मंजूर करते हुए कोर्ट ने वाराणसी कोर्ट के फैसले पर भी रोक लगा दी।
कोर्ट ने कहा कि किसी नेता के चुनाव लड़ने के अधिकार को आम आदमी की रोजी-रोटी के अधिकार से ज्यादा अहम नहीं माना जा सकता। लेकिन अपील का आखिरी फैसला आने तक संबंधित व्यक्ति अपना गुजारा कर सके, इसके लिए दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाना जरूरी हो सकता है। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का भी हवाला दिया। कोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कई जनप्रतिनिधियों की दोषसिद्धि पर रोक लगाई है।
हाईकोर्ट ने समाजवादी पार्टी के गाजीपुर के सांसद अफजल अंसारी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी की दोषसिद्धि पर रोक लगाते वक्त उस मामले के खास तथ्यों और हालात को देखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि अगर रोक न देने से नाइंसाफी होने की आशंका हो, या उसके नतीजे बाद में सुधारे न जा सकें, तो ऐसे हालात में रोक पर विचार किया जा सकता है।
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