ग्रामीण महिला दिवस: स्मार्टफोन और लखपती दीदी योजना से बदल रही है गांव की महिलाओं की तस्वीर
15 अक्टूबर को मनाए जाने वाले ग्रामीण महिला दिवस पर गांव की महिलाओं की मेहनत, उनकी दिक्कतें और स्वयं सहायता समूह, लखपती दीदी योजना व डिजिटल तकनीक से आ रहा बदलाव।
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हर साल 15 अक्टूबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन करोड़ों महिलाओं की मेहनत, संघर्ष और योगदान को सलाम करने का है, जो शहरों की चमक से दूर गांव में रहकर अपने पसीने से देश का भविष्य गढ़ती हैं। इनका दिन सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होता है और रात देर तक खेत, गोशाला और घर के कामों में चलता रहता है। ये महिलाएं सिर्फ खाना पकाकर परिवार का पेट नहीं भरतीं, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा का बोझ भी अपने कंधों पर उठाती हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने 2007 में इस दिन की औपचारिक घोषणा की थी और 15 अक्टूबर 2008 को पहला ग्रामीण महिला दिवस मनाया गया। इसका मकसद गांव की महिलाओं की मुश्किल हालत को दुनिया के सामने लाना, उनके हक की हिफाजत करना और राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक फैसलों में उन्हें बराबर जगह दिलाना है। दुनिया की एक तिहाई से ज्यादा आबादी ग्रामीण महिलाओं की है। खासकर विकासशील देशों में खेती के काम में लगे करीब 43 फीसदी मजदूर महिलाएं ही हैं।
भारत जैसे खेती प्रधान देश में गांव की महिलाओं की भूमिका और भी अहम हो जाती है। बुवाई से लेकर रोपाई, निराई, गुड़ाई और फसल की कटाई तक खेत के लगभग हर मुश्किल काम में महिलाएं शामिल रहती हैं। इसके अलावा पशुपालन, दूध का काम, जलाऊ लकड़ी और पीने के पानी का इंतजाम भी वे संभालती हैं। कई दूरदराज के इलाकों में महिलाएं मीलों पैदल चलकर पीने का पानी लाती हैं। इस तरह वे पानी के इंतजाम की असली जानकार हैं।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि खेत में पुरुषों से ज्यादा वक्त और मेहनत देने के बाद भी उन्हें अक्सर किसान के रूप में आधिकारिक पहचान नहीं मिलती। जमीन का मालिकाना हक न होना, क्रेडिट या कर्ज न मिलना और मजदूरी में भेदभाव जैसी दिक्कतों का सामना उन्हें आज भी करना पड़ता है। फिर भी वे बिना किसी शिकायत के देश के अनाज उत्पादन की कड़ी को चलाती रहती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि ग्रामीण महिला सिर्फ खाने का इंतजाम करने वाली नहीं, बल्कि पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
आज के दौर में गांव की महिलाओं की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। महिला स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups), लखपती दीदी योजना और कई सरकारी पहलों की वजह से गांव-देहात की महिलाएं आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रही हैं। छोटे-बड़े गृह उद्योग, हस्तकला, जैविक खेती, दूध का काम और प्रोसेसिंग उद्योगों के जरिए उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होकर परिवार को आर्थिक सहारा दिया है।
डिजिटल क्रांति की वजह से अब ग्रामीण महिलाओं के हाथ में स्मार्टफोन भी आ गए हैं। मौसम का अनुमान, फसलों के बाजार भाव, सरकारी योजनाओं की जानकारी और यूपीआई (UPI) से डिजिटल पेमेंट सीखकर वे आधुनिक दुनिया से जुड़ रही हैं। जब किसी ग्रामीण महिला को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक आजादी और फैसले लेने का अधिकार मिलता है, तो सिर्फ उसका परिवार ही नहीं सुधरता, पूरा गांव तरक्की की राह पर दौड़ने लगता है। शिक्षा और सेहत पर निवेश ही ग्रामीण सशक्तीकरण की असली कुंजी है।
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में गरीबी हटाना, भूख मिटाना, लैंगिक समानता और जलवायु परिवर्तन जैसे अहम लक्ष्य हैं। इन्हें ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी के बिना पूरा करना नामुमकिन है। आज जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का सबसे बड़ा असर ग्रामीण महिलाओं पर पड़ रहा है। बेमौसम बारिश, सूखे या बाढ़ से होने वाले नुकसान की मार उन्हें सीधे झेलनी पड़ती है।
इसलिए इस साल ग्रामीण महिला दिवस मनाते वक्त सिर्फ भाषण या शुभकामनाएं देकर रुकना काफी नहीं है। उनकी जिंदगी में असल बदलाव लाने का संकल्प करना जरूरी है। उन्हें जमीन का अधिकार देना, बैंक से आसान कर्ज दिलाना, आधुनिक खेती की तकनीक की ट्रेनिंग देना और ऊंची पढ़ाई के मौके मुहैया कराना वक्त की जरूरत है। मिट्टी में मेहनत करने वाले इन हाथों को जब सम्मान और सही मंच मिलेगा, तभी असली मायने में समृद्ध भारत और सशक्त दुनिया बन पाएगी।