एरंडोल तालुका में 2,146 बुजुर्गों ने दी साक्षरता परीक्षा, 90 केंद्रों पर हुआ आयोजन
उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत एरंडोल तालुका में रविवार को हुई परीक्षा में 2 हजार 146 दादा-दादी बैठे, 30 गैरहाजिर रहे।
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एरंडोल तालुका में रविवार, 25 अक्टूबर को साक्षरता की परीक्षा हुई। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चली इस परीक्षा में बड़े जोश का माहौल था। तालुका के 90 परीक्षा केंद्रों पर कुल 2 हजार 146 दादा-दादी ने पेपर दिया।
यह परीक्षा केंद्र सरकार के 'उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम' के तहत ली गई। इस कार्यक्रम का मकसद देश में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के जो लोग पढ़-लिख नहीं सकते, उन्हें साक्षर बनाना है। परीक्षा का नाम बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान मूल्यांकन परीक्षण था।
परीक्षा देने वालों ने दिखा दिया कि पढ़ाई के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती। इनमें 1 हजार 364 महिलाएं और 782 पुरुष शामिल थे। यानी पेपर देने वालों में महिलाओं की तादाद ज्यादा रही। वहीं 30 दादा-दादी परीक्षा में नहीं आए।
इस परीक्षा के लिए कुल 2 हजार 176 लोगों ने नाम दर्ज कराया था। इनमें 1 हजार 374 महिलाएं और 802 पुरुष थे। पंजीकरण के आंकड़े और परीक्षा में बैठने वालों की गिनती के बीच यही 30 का फर्क रहा।
परीक्षा कुल 100 अंकों की थी। इसमें वाचन-लेखन और संख्याज्ञान, दोनों हिस्सों से 50-50 अंकों के सवाल पूछे गए। पास होने के लिए हर हिस्से में कम से कम 33 प्रतिशत अंक, यानी 18 अंक लाना जरूरी है। जो 30 बुजुर्ग गैरहाजिर रहे, उन्हें आगे दोबारा परीक्षा देने का मौका मिलेगा या नहीं, इसे लेकर लोगों में उत्सुकता है।
तालुका के सभी केंद्रों पर इंतजाम पुख्ता रखे गए थे। यह सब जिलाधिकारी रोहन घुगे, जिला परिषद की मुख्य कार्यकारी अधिकारी करिश्मा नायर, शिक्षा अधिकारी कल्पना चव्हाण और खंड शिक्षा अधिकारी आर. डी. महाजन के मार्गदर्शन में हुआ। आयोजन को कामयाब बनाने में एरंडोल तालुका समन्वयक एल. आर. पाटील और सभी शिक्षकों ने खास मेहनत की।
उल्लास नवभारत साक्षरता अभियान में सिर्फ पढ़ना, लिखना और बुनियादी हिसाब-किताब ही नहीं सिखाया जाता। रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली कुछ और बातों पर भी जोर दिया जा रहा है। इनमें बैंकिंग के लेन-देन और डिजिटल सेवाओं का भरोसे के साथ इस्तेमाल करना शामिल है। रोजाना की सेहत की देखभाल और साफ-सफाई की समझ भी इसका हिस्सा है। इसके अलावा सरकारी योजनाओं की जानकारी लेना और अपने हक पहचानना सिखाया जाता है, साथ ही पर्यावरण को लेकर जागरूकता भी बढ़ाई जाती है।
जिन लोगों की पढ़ाई अधूरी रह गई थी, उन्हें साक्षरता की मुख्य धारा में लाकर उनके रोजमर्रा के काम ज्यादा भरोसे से निपटाने लायक बनाना इस पहल का मकसद है। एरंडोल तालुका में यह उपक्रम लोगों के लिए बहुत प्रेरणा देने वाला साबित हो रहा है।
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