एआई के भरोसे पढ़ाई पड़ेगी भारी, आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर ने छात्रों को चेताया
आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर प्लाबन कुमार भौमिक का कहना है कि एआई सिर्फ जवाब पाने का जरिया नहीं, समझने का साथी बनना चाहिए।
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आजकल पढ़ाई, असाइनमेंट और रिसर्च में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छात्र कुछ ही सेकंड में सवालों के जवाब और असाइनमेंट तैयार करवा लेते हैं। लेकिन आईआईटी खड़गपुर के एक प्रोफेसर ने चेतावनी दी है कि अगर छात्र हर सवाल के जवाब के लिए पूरी तरह एआई पर टिके रहे, तो वे असल में सीखने की प्रक्रिया से दूर हो सकते हैं।
यह चेतावनी आईआईटी खड़गपुर के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग के प्रोफेसर प्लाबन कुमार भौमिक ने दी है। वे नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया (NDLI) के प्रमुख शोधकर्ता भी हैं। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करते हुए उन्होंने कहा कि एआई छात्रों की सोचने की क्षमता को प्रभावित भी कर सकता है और उसे बढ़ाने में मदद भी कर सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि छात्र उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं।
प्रोफेसर भौमिक के मुताबिक एआई का इस्तेमाल सिर्फ तैयार जवाब पाने के लिए नहीं होना चाहिए। उसे विषय समझने और खुद समस्या सुलझाने की क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने फर्क समझाने के लिए दो धारणाओं का सहारा लिया, 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' और 'कॉग्निटिव स्कैफोल्डिंग'।
जब छात्र किसी सवाल को खुद समझने और हल करने की कोशिश करने के बजाय सोचने की पूरी जिम्मेदारी एआई को सौंप देते हैं, तो उसे कॉग्निटिव ऑफलोडिंग कहते हैं। मिसाल के तौर पर, अगर कोई छात्र किसी विषय का असाइनमेंट पूरा करने के लिए एआई से सीधे पूरा जवाब बनवा ले और उसे समझने की कोशिश न करे, तो उसका असाइनमेंट तो पूरा हो जाएगा, लेकिन जरूरी ज्ञान उसके हाथ से छूट जाएगा।
प्रोफेसर का कहना है कि एआई इस्तेमाल करना गलत नहीं है। असली बात यह है कि छात्र उसका इस्तेमाल किस तरह कर रहे हैं। अगर वे खुद सवाल समझने के बजाय एआई से सीधे जवाब ले लेते हैं, तो विषय की गहरी जानकारी हासिल करने और अपनी सोचने की ताकत बढ़ाने से वंचित रह सकते हैं।
इसके उलट कॉग्निटिव स्कैफोल्डिंग का मतलब है कि सीखते वक्त छात्रों को इस तरह मदद दी जाए कि वे धीरे-धीरे खुद सवाल समझना और उनके जवाब खोजना सीख जाएं। इसमें एआई सीधा जवाब देने के बजाय संकेत देता है और सही दिशा में सोचने में मदद करता है। प्रोफेसर भौमिक के मुताबिक एआई की मदद से छात्र सवाल समझ सकते हैं और जवाब खोजने के तरीके सीख सकते हैं, लेकिन जवाब ढूंढने की कोशिश उन्हें खुद ही करनी चाहिए। इससे उनकी समझ बढ़ती है और आगे चलकर वे मुश्किल सवाल भी अपने दम पर हल कर पाते हैं।
इसके लिए प्रोफेसर भौमिक 'फर्मी एआई ट्यूटर' के इस्तेमाल की बात करते हैं। उनके मुताबिक यह टूल छात्रों को सीधे जवाब देने के बजाय खुद सवाल समझने और जवाब खोजने में मदद करता है। यह उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करता है, अलग-अलग रास्तों से जवाब तलाशने को कहता है और जरूरत पड़ने पर सही दिशा भी दिखाता है।
प्रोफेसर भौमिक का कहना है कि यह टूल सिर्फ जवाब पाने का साधन नहीं है, बल्कि एक साथी की तरह काम करता है जो छात्रों को सीखने और अपनी समस्याएं खुद सुलझाने में मदद करता है। 'फर्मी एआई ट्यूटर' नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया (NDLI) के जरिए मुफ्त में उपलब्ध है।
शिक्षा के क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में छात्रों के लिए जरूरी है कि वे उसे सिर्फ असाइनमेंट पूरा करने के लिए न अपनाएं, बल्कि विषय समझने और नई चीजें सीखने के लिए इस्तेमाल करें। एआई की मदद तभी फायदेमंद होगी जब छात्र खुद सोचें और सवालों के जवाब समझने की कोशिश करें। सही इस्तेमाल से उनकी सोचने, तर्क करने और समस्या खुद सुलझाने की क्षमता और बेहतर हो सकती है।