दिवाली 2026: धनतेरस पर नई बही की खरीद, लक्ष्मीपूजन पर चोपड़ी पूजन के मुहूर्त और मान्यता
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धनतेरस पर नई बही या चोपड़ी लाने और लक्ष्मीपूजन पर उसकी पूजा करने की परंपरा है। जानिए 6 और 8 नवंबर के मुहूर्त और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता।
दिवाली भारतीय संस्कृति का बड़ा और खुशहाली वाला त्योहार है। खासकर व्यापारियों और आम लोगों के लिए धनतेरस और लक्ष्मीपूजन के दिन बहुत मायने रखते हैं। इन दिनों नए साल के हिसाब-किताब के लिए नई बही या चोपड़ी (खाता-बही) खरीदने और उसकी पूजा करने की पवित्र परंपरा चली आ रही है।
पंचांग के हिसाब से बही खरीदने के लिए धनतेरस का दिन सबसे अच्छा माना जाता है, जबकि उसकी पूजा यानी चोपड़ी पूजन लक्ष्मीपूजन के दिन होता है।
शुक्रवार 6 नवंबर को त्रयोदशी तिथि 10:30 बजे से शुरू होगी। इस दिन दिन में खरीदारी का शुभ समय सुबह 10:30 से दोपहर 2:15 बजे तक रहेगा, क्योंकि इसमें उत्तम चौघड़िया और त्रयोदशी ऊर्जा रहती है। शाम को प्रदोष काल में खरीदारी और पूजा का मुहूर्त 6:02 बजे से रात 7:57 बजे तक है। यह वक्त स्थिर लग्न, यानी वृषभ काल का है, इसलिए बही खरीदने और घर लाने के लिए बहुत शुभ माना जाता है।
रविवार 8 नवंबर को अमावस्या तिथि सुबह 11:27 बजे शुरू होगी। चोपड़ी पूजन का मुख्य शुभ मुहूर्त शाम 5:31 से रात 10:27 बजे तक है, जिसमें शुभ, अमृत और चर चौघड़िया मिलेंगे। प्रदोष काल का पूजा मुहूर्त शाम 6:14 से रात 8:13 बजे तक है।
हिंदू धर्म और ज्योतिषशास्त्र में किसी भी नए काम की शुरुआत या अहम चीजों की खरीद शुभ मुहूर्त में करने की बड़ी अहमियत है। बही या चोपड़ी सिर्फ कागज की किताब नहीं मानी जाती, वह आपकी आर्थिक जिंदगी, मेहनत और किस्मत का आईना होती है।
मान्यता है कि धनतेरस और लक्ष्मीपूजन के दिन धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की लहरें ब्रह्मांड में खूब सक्रिय रहती हैं। ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक प्रदोष काल में जब वृषभ लग्न यानी स्थिर लग्न हो, तब की गई खरीद घर में स्थायी ऐश्वर्य लाती है। श्रद्धा यह भी है कि मुहूर्त में बही लाने से कारोबार या नौकरी में पैसों की आवक टिकी रहती है और फालतू खर्च नहीं होता।
नई बही लाने का मतलब पुराने हिसाब चुकता करके नई, कोरी और सकारात्मक ऊर्जा के साथ शुरुआत करना है। माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में लाई गई बही में दर्ज होने वाले लेनदेन में बरकत यानी बढ़ोतरी होती है। इससे कारोबार पर चढ़ा कर्ज उतारने में मदद मिलती है और पैसों का लेनदेन ठीक चलता है।
दिवाली की पूजा में सिर्फ पैसों की नहीं, बुद्धि और ज्ञान की भी पूजा होती है। माता लक्ष्मी धन देती हैं, श्री गणेश उस धन को सही तरीके से खर्च करने की समझ (विवेक) देते हैं, और माता सरस्वती, जिनका प्रतीक हिसाब की बही या चोपड़ी है, लेनदेन में पारदर्शिता और ज्ञान देती हैं। मुहूर्त में बही खरीदकर उसकी पूजा करने से तीनों देवताओं का आशीर्वाद एक साथ मिलता है।
जब हम कोई काम शास्त्र के हिसाब से, वक्त का ध्यान रखकर और आदर के साथ करते हैं, तो मन में उस काम को लेकर बहुत सकारात्मकता आती है। शुभ मुहूर्त में लाई गई बही नए साल में ईमानदारी से और फायदेमंद कारोबार करने का संकल्प मजबूत करती है।
बही खरीदते वक्त उसका कवर (पुट्ठा) हो सके तो लाल, पीले या हरे रंग का हो। काले रंग की बही खरीदने से बचना चाहिए।
लक्ष्मीपूजन के दिन नई बही के पहले पन्ने पर कुमकुम से 'श्री', स्वस्तिक और 'शुभ-लाभ' लिखना चाहिए। इसके बाद ही अगले साल का हिसाब या नए संकल्प लिखना शुरू करें। आजकल कई लोग कंप्यूटर या लैपटॉप पर हिसाब रखते हैं। ऐसे में लैपटॉप या अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर की पूजा कर लें, फिर भी चालीस साल की परंपरा के नाते एक छोटी सी ही सही, नई डायरी या बही लाकर उसकी पूजा जरूर करनी चाहिए।
धर्म, ज्योतिष और वास्तु से जुड़ी ये बातें सिर्फ पाठकों की जानकारी के लिए हैं। इनमें से कोई भी प्रयोग करने से पहले जानकार की सलाह लेना जरूरी है।
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