देश भर में अलग-अलग अंदाज़ में मनता है कोजागिरी पूर्णिमा का त्योहार
आश्विन की पूर्णिमा पर महाराष्ट्र में औटाया हुआ दूध और जागरण होता है, तो बंगाल, गुजरात, ओडिशा और उत्तर भारत की अपनी परंपराएं हैं।
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आश्विन महीने की पूर्णिमा को कोजागिरी पूर्णिमा मनाई जाती है। इसे शरद पूर्णिमा और कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं, और अलग-अलग इलाकों में इसके अलग नाम हैं। बारिश का मौसम खत्म होकर शरद ऋतु शुरू होती है, तब आसमान में पूरा चांद चमकता है, रात चांदनी से नहाई होती है और चांद की रोशनी में रखे दूध का प्रसाद बनता है। इन्हीं वजहों से इस त्योहार की खास अहमियत है।
भारतीय संस्कृति में त्योहारों का मतलब सिर्फ धार्मिक महत्व नहीं होता। उनके साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएं भी जुड़ी रहती हैं। कोजागिरी पूर्णिमा भी ऐसा ही एक खास त्योहार है।
धार्मिक मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पूछती हैं, "को जागर्ति?" यानी "कौन जाग रहा है?" ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस रात जागरण करके लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर देवी की कृपा होती है। महाराष्ट्र में औटाए हुए दूध का स्वाद लेते हुए जागरण किया जाता है, जबकि देश के दूसरे हिस्सों में लक्ष्मीपूजन, रास-गरबा, कुमारिका पूजन और श्रीकृष्ण की रासलीला का आयोजन होता है।
महाराष्ट्र में इस दिन खास उत्साह रहता है। कुछ जगहों पर रात को लक्ष्मीपूजन और इंद्रपूजन की परंपरा मिलती है, जिसमें ऐरावत पर सवार इंद्र की पूजा होती है। लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर साफ किए जाते हैं और दिए सजाए जाते हैं।
कोजागिरी का सबसे बड़ा आकर्षण औटाया हुआ दूध है। दूध को औटाकर उसमें शक्कर, केसर, इलायची, बादाम और पिस्ता डाला जाता है। इसे चांद की रोशनी में रखकर बाद में प्रसाद के तौर पर लिया जाता है। पारंपरिक मान्यता है कि चांदनी में रखा दूध सेहत के लिए फायदेमंद होता है।
शहरों में परिवार और दोस्त इमारतों की छतों, आंगन या खुली जगह पर इकट्ठा होते हैं। गाने, भजन, गपशप और तरह-तरह के खेलों के साथ रात जागकर बिताई जाती है। कई जगह सामूहिक कोजागिरी होती है और सबको दूध का प्रसाद दिया जाता है। इस तरह महाराष्ट्र में यह त्योहार धार्मिक श्रद्धा के साथ पारिवारिक लगाव और सामाजिक एकता का प्रतीक बन गया है।
पश्चिम बंगाल में इसे "कोजागरी लक्ष्मी पूजा" या "लोख्खी पुजो" कहते हैं। बंगाली समाज में इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा का खास महत्व है। दुर्गापूजा खत्म होने के बाद आने वाली इस पूर्णिमा पर कई परिवारों में लक्ष्मीपूजा होती है। घर साफ करके दरवाजे से लेकर देवघर तक चावल के आटे से सुंदर "अल्पना" बनाई जाती है। इस पारंपरिक रंगोली में शुभ चिन्ह और देवी लक्ष्मी के पैरों के निशान बनाए जाते हैं। भावना यह रहती है कि देवी घर में आएं और परिवार को सुख, समृद्धि मिले। देवी को फल, मिठाई, खीर और दूसरी चीजों का भोग लगता है। कुछ परिवारों में खिचड़ी भी भोग में होती है।
गुजरात में यह त्योहार "शरद पूनम" के नाम से मशहूर है। इस दिन चांद की खास अहमियत मानी जाती है और पूर्णिमा की चांदनी में रास-गरबा खेलने की परंपरा इसका मुख्य आकर्षण है। कई जगह मंदिरों के प्रांगण, सार्वजनिक मैदानों और घरों के आंगन में रास-गरबा होता है। पारंपरिक पोशाक में महिलाएं और पुरुष साथ मिलकर ताल पर नाचते हैं। भक्तिगीत, लोकगीत और पारंपरिक संगीत से पूरा इलाका उत्साह से भर जाता है। कुछ जगहों पर चांद की रोशनी में दूध और "पौंआ" यानी पोहा खाने की परंपरा है। श्रीकृष्ण की भक्ति से जुड़े रासोत्सव को भी अहमियत दी जाती है।
ओडिशा में कोजागिरी पूर्णिमा को "कुमार पूर्णिमा" कहते हैं। कुंवारी और जवान लड़कियों के जीवन में इसका खास स्थान है। इस दिन लड़कियां पारंपरिक पोशाक पहनकर अलग-अलग धार्मिक विधि करती हैं। कुछ परंपराओं में सूर्योदय से उपवास रखा जाता है और चांद दिखने के बाद उसकी पूजा करके भोग चढ़ाया जाता है। कुछ जगह अच्छा जीवनसाथी मिलने और आगे का जीवन सुखी होने की प्रार्थना करने की प्रथा है। "खई" यानी लाई, गुड़, नारियल, केला और तरह-तरह के फलों का भोग लगाया जाता है। पारंपरिक गीत, नृत्य और खेलों के साथ त्योहार मनता है।
उत्तर भारत में मथुरा, वृंदावन और ब्रजभूमि में शरद पूर्णिमा का खास धार्मिक महत्व है। यह पूर्णिमा भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों की दिव्य रासलीला से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक शरद पूर्णिमा की चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास किया था। इसलिए वृंदावन और ब्रज के कृष्ण मंदिरों में इस दिन खास पूजा, भजन, कीर्तन और रासलीला के कार्यक्रम होते हैं।
राधा-कृष्ण की मूर्तियों को सुंदर वस्त्रों और गहनों से सजाया जाता है। कुछ मंदिरों में सफेद रंग के वस्त्रों को खास तरजीह दी जाती है। चांद की सफेद रोशनी से मेल खाती यह सजावट भक्तों के मन में भक्तिभाव जगाती है। भक्त इस रात श्रीकृष्ण की लीलाओं को याद करने, भजन-कीर्तन में शामिल होने और दर्शन करने को खास अहमियत देते हैं। इस परंपरा से प्रेम, भक्ति और परमेश्वर से एकरूप होने का आध्यात्मिक संदेश मिलता है।
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