बुधवार, 16 सितमबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
23:24 IST

ब्रिक्स देश डॉलर को टक्कर देने नई पेमेंट व्यवस्था पर दिल्ली में मंथन में जुटे

भारत मंडपम में हुई 18वीं ब्रिक्स परिषद में डॉलर के दबदबे को कम करने के लिए स्थानीय करेंसी और डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर चर्चा हुई।

ब्रिक्स देश डॉलर को टक्कर देने नई पेमेंट व्यवस्था पर दिल्ली में मंथन में जुटे तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, मिडिल ईस्ट में जंग जैसे हालात और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की तरफ से अलग-अलग देशों पर लगाई जा रही टैरिफ की धमकियों ने पूरी दुनिया के व्यापार में भारी अनिश्चितता खड़ी कर दी है। इसी माहौल में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले ब्रिक्स देश डॉलर का एक मजबूत विकल्प खोजने की कोशिश तेज कर रहे हैं।

पिछले कई दशकों से अमेरिकी डॉलर ग्लोबल ट्रेड की रीढ़ रहा है। छह बड़ी करेंसी के मुकाबले डॉलर की ताकत बताने वाला डॉलर इंडेक्स (DXY) फिलहाल 99.09 के लेवल पर ट्रेड कर रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल के दाम में उछाल (ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के पार) की वजह से इंटरनेशनल इनवेस्टर आज भी सेफ ऑप्शन के तौर पर डॉलर को ही तरजीह दे रहे हैं। लेकिन कई देशों का आरोप है कि अमेरिका डॉलर की इसी ताकत का इस्तेमाल अपने राजनीतिक और आर्थिक फायदे के लिए करता है।

असल में अमेरिका अपनी दुनिया भर में पकड़ बनाए रखने के लिए रूस और ईरान जैसे देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है और उन्हें बैंकिंग नेटवर्क स्विफ्ट (SWIFT) से बाहर कर देता है, जिससे उन देशों का इंटरनेशनल ट्रेड ठप पड़ जाता है। लेकिन अब ब्रिक्स का दायरा बढ़ चुका है। इसमें भारत, चीन, रूस, ब्राजील, साउथ अफ्रीका जैसे पुराने सदस्यों के अलावा यूएई और सऊदी अरब जैसे तेल उत्पादक और ताकतवर अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हो गई हैं।

अगर ब्रिक्स देश अपना डिजिटल पेमेंट नेटवर्क या स्वतंत्र वित्तीय सिस्टम खड़ा करने में कामयाब हो जाते हैं, तो अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों का हथियार कमजोर पड़ जाएगा। जब ये सभी देश डॉलर की जगह अपनी-अपनी लोकल करेंसी में जैसे रुपया, युआन, रूबल, दिरहम में तेल और दूसरी चीजों का इंटरनेशनल ट्रेड करेंगे, तो ग्लोबल मार्केट में डॉलर की डिमांड काफी घट जाएगी। इससे अमेरिकी इकोनॉमी को बड़ा झटका लग सकता है, और यही अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता है।

नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 18वीं ब्रिक्स समिट में इसी मुद्दे पर गंभीरता से बातचीत चल रही है। ब्रिक्स के सदस्य देश अपने-अपने सेंट्रल बैंक के डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी (CBDC) को इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन के लिए आपस में कैसे जोड़ा जाए, इस पर जोर दे रहे हैं। ऐसा होने से बैंकिंग बिचौलियों के बिना सीधे और तेज ट्रेड मुमकिन हो सकेगा।

हालांकि यूरोपीय यूनियन के यूरो की तरह एक साझा फिजिकल या डिजिटल ब्रिक्स करेंसी लाना बेहद मुश्किल और पेचीदा माना जा रहा है, क्योंकि चीन के युआन, भारत के रुपये और रूस के रूबल की आर्थिक नीतियां और राष्ट्रीय हित अलग-अलग हैं। भारत पहले ही साफ कर चुका है कि वह किसी एक साझा ब्रिक्स करेंसी के बजाय अपनी-अपनी लोकल करेंसी में ट्रेड बढ़ाने के पक्ष में है।

माहिरों का मानना है कि अमेरिकी डॉलर का दबदबा रातोंरात खत्म होना या डॉलर का पूरी तरह बाहर हो जाना फिलहाल मुमकिन नहीं है। दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार, बॉन्ड मार्केट और इंटरनेशनल ट्रेड में आज भी डॉलर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। ब्रिक्स देशों की मौजूदा कोशिश डॉलर को पूरी तरह खत्म करने की नहीं, बल्कि आने वाले वक्त में किसी भी आर्थिक इमरजेंसी की सूरत में अपनी सुरक्षा के लिए एक मजबूत और वैकल्पिक सिस्टम तैयार करने की है।

आगे चलकर ब्रिक्स देशों का यह नया पेमेंट सिस्टम ग्लोबल फाइनेंशियल दुनिया में क्या असर दिखाता है और अमेरिका इस चुनौती का किस तरह सामना करता है, इस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

अभी कोई अपडेट नहीं

खबर छप चुकी है, लेकिन लाइव थ्रेड अभी शुरू नहीं हुआ। डेस्क कोई अपडेट डालते ही वह यहाँ दिखेगा।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे