बिल के भुगतान पर दर्ज मामले में नीलेश सांबरे को राहत, हाईकोर्ट ने कहा राजनीतिक रंजिश
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने सार्वजनिक निर्माण विभाग के काम के बिल से जुड़े मामले में नीलेश सांबरे के खिलाफ सख्त कार्रवाई न करने का अंतरिम आदेश दिया। अदालत ने मामले के पीछे राजनीतिक मकसद और रंजिश की टिप्पणी की।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और ठेकेदार नीलेश सांबरे को बड़ी राहत दी है। अदालत ने अंतरिम आदेश में कहा है कि उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न की जाए। मामला सार्वजनिक निर्माण विभाग के एक काम के बिल से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस मामले के पीछे साफ तौर पर राजनीतिक मकसद और राजनीतिक रंजिश दिखती है। यह फैसला न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव की एकल पीठ ने सुनाया।
मामले की शुरुआत 2015 से होती है। नीलेश सांबरे ने उस साल सार्वजनिक निर्माण विभाग का एक विकास कार्य पूरा किया था। इस काम का बिल लंबे समय तक बकाया रहा। सांबरे ने काम के पैसे की मांग की, तो सरकार की तरफ से उन्हें 73 लाख 13 हजार 884 रुपये दिए गए।
इसके करीब 11 साल बाद, यानी 2026 में, बजट की गणना प्रणाली (बजट मिसकैल्कुलेशन) में गड़बड़ियों के चलते इस भुगतान को लेकर विभाग की अंदरूनी जांच शुरू हुई। जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह रकम ठेकेदार को अनजाने में दे दी गई थी। इसके बाद विभाग ने सांबरे को नोटिस भेजकर रकम तुरंत लौटाने को कहा।
सरकारी नोटिस मिलते ही सांबरे ने पूरे 73 लाख 13 हजार 884 रुपये फौरन लौटा दिए। फिर भी उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इस कार्रवाई के खिलाफ सांबरे ने वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पासबोला के जरिए हाईकोर्ट में आपराधिक रिट याचिका दायर की।
याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जाधव ने उपलब्ध कागजात की बारीकी से जांच की। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता सिर्फ ठेकेदार नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। उनकी संस्था कई धर्मार्थ अस्पताल, नेत्रहीन बच्चों के स्कूल और मुफ्त पुस्तकालय चलाती है। अदालत के मुताबिक उन्होंने अपने करियर में करोड़ों रुपये के ठेके के काम सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। जब सरकार ने रकम को लेकर नोटिस दिया, तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर पूरी रकम तुरंत चेक से जमा कर दी। इसके बावजूद उन पर मामला दर्ज किया गया, यह बात अदालत ने दर्ज की।
हाईकोर्ट ने सांबरे को कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण दे दिया। राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में विस्तृत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को दो हफ्ते में अपना पक्ष रखने की छूट दी गई है। अतिरिक्त सरकारी वकील संगीता फड ने राज्य सरकार की ओर से नोटिस स्वीकार किया। मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर 2026 को होगी।
हाईकोर्ट के इस फैसले से चुनाव और राजनीतिक हलचल के बीच नीलेश सांबरे को बड़ी राहत मिली है।


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