भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने बनाया नन्हा सुपरकैपेसिटर, रोशनी में बढ़ती है क्षमता
भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का बनाया सूक्ष्म सुपरकैपेसिटर रोशनी के संपर्क में ज्यादा ऊर्जा जमा करता है; प्रयोगों में 5,000 चक्रों के बाद भी करीब 88 प्रतिशत क्षमता बनी रही।
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छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए ज्यादा असरदार, जल्दी चार्ज होने वाला और लंबा चलने वाला ऊर्जा-भंडारण बनाने की दिशा में भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने अहम कदम उठाया है। इन शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सूक्ष्म सुपरकैपेसिटर तैयार किया है, जो रोशनी के संपर्क में आने पर ऊर्जा जमा करने की अपनी क्षमता बढ़ा लेता है।
इस काम में भारतीय विज्ञान संस्थान, आईआईटी मुंबई, इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी दिल्ली और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ता शामिल रहे। प्रयोगों में देखा गया कि रोशनी पड़ने पर उपकरण का प्रदर्शन काफी बेहतर हो जाता है।
मोबाइल उपकरण, स्मार्ट घड़ियां, मेडिकल सेंसर और पहनने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स का आकार लगातार छोटा हो रहा है। ऐसे में इन्हें बिजली देने वाले उपकरण भी छोटे और कारगर होने चाहिए। पारंपरिक सूक्ष्म सुपरकैपेसिटर में ऊर्जा जमा करने की क्षमता और कार्यक्षमता की कुछ सीमाएं रहती हैं। इन्हें दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने टाइटेनियम पर आधारित एक खास पदार्थ का इस्तेमाल किया।
उन्होंने टाइटेनियम सेस्क्विऑक्साइड के नैनो-कणों को हाइड्रोजन और आर्गन गैसों के नियंत्रित मिश्रण में 400 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ट्रीट किया। इस हाइड्रोजन प्रक्रिया से पदार्थ के गुण बेहतर हुए।
इसी पदार्थ से शोधकर्ताओं ने चिप पर लगाया जा सकने वाला सपाट सूक्ष्म सुपरकैपेसिटर बनाया। प्रयोगों में इस उपकरण की विशिष्ट धारिता 13.5 मिलिफैरड प्रति वर्ग सेंटीमीटर दर्ज की गई। शोध रिपोर्ट के मुताबिक यह कार्बन आधारित सूक्ष्म सुपरकैपेसिटर के मुकाबले करीब सात गुना है।
उपकरण की टिकाऊ क्षमता भी परखी गई। लगातार 5,000 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी उसने शुरुआती धारिता की करीब 88 प्रतिशत क्षमता बनाए रखी। जिन छोटे उपकरणों को बार-बार चार्ज और डिस्चार्ज करना पड़ता है, उनके लिए यह तकनीक काम की मानी जा सकती है।
आगे चलकर इस तकनीक का इस्तेमाल स्मार्ट कपड़ों, छोटे मेडिकल सेंसरों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स उपकरणों और सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में हो सकता है। रोशनी की मदद से ऊर्जा-भंडारण बढ़ाने की यह क्षमता इन उपकरणों को ज्यादा कारगर बनाने में मदद कर सकती है।
हालांकि कारोबारी इस्तेमाल से पहले इसकी लंबे समय की स्थिरता, बनाने का खर्च और असली हालात में प्रदर्शन की जांच जरूरी है।