असम के दिब्रू-सैखोवा जंगल में मिली परजीवी गांधीलमक्खी की नई प्रजाति, भारत में पहली बार दर्ज
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संस्था के वैज्ञानिकों को असम के दिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में सिर्फ 3.3 मिलिमीटर की एक दुर्लभ परजीवी गांधीलमक्खी मिली है, जिसका नाम दिवंगत वैज्ञानिक डॉ. टी. सी. नरेंद्रन के सम्मान में रखा गया है।
असम के दिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के जंगल में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संस्था यानी जेडएसआई के वैज्ञानिकों को परजीवी गांधीलमक्खी की एक बिलकुल नई प्रजाति मिली है। इस नई प्रजाति को 'ऑक्सिसर्फस नरेंद्रानी' नाम दिया गया है। खास बात यह है कि ओरिएंटल जैवभौगोलिक क्षेत्र में इस दुर्लभ समूह के कीट की यह पहली आधिकारिक दर्ज घटना है।
यह खोज संशोधक रुपम देबनाथ और केलोथ राजमोहन की मेहनत का नतीजा है। नवंबर 2024 में दोनों ने दिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में पीले रंग के पानी से भरी ट्रे वाला एक सादा सा जाल लगाया था। ऐसे जाल आम तौर पर कीड़ों को आकर्षित करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इसी जाल में मिले नमूने की बाद में सूक्ष्मदर्शक के नीचे बारीकी से जांच की गई।
जांच में पता चला कि यह कीट प्रॉक्टोटुपिडी परिवार की परजीवी गांधीलमक्खियों की एक ऐसी प्रजाति है जिसके बारे में अब तक कुछ पता ही नहीं था। गांधीलमक्खियों का यह पूरा समूह 'डार्क टैक्सा' कहलाता है, यानी ऐसा जीव-समूह जिस पर अभी बहुत कम रिसर्च हुई है। ऑक्सिस्पस प्रजाति के कीट दुनिया भर के संग्रहालयों में भी बहुत मुश्किल से मिलते हैं।
ऑक्सिसर्फस नरेंद्रानी की लंबाई महज 3.3 मिलिमीटर है। इसका सिर काला, शरीर भूरे-काले रंग का और पैर चमकीले पीले रंग के हैं। चूंकि परजीवी गांधीलमक्खियों की अलग-अलग प्रजातियां देखने में लगभग एक जैसी लगती हैं, इसलिए इसकी पहचान पक्की करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसकी शरीर रचना की बारीक खासियतों का अध्ययन किया।
इस दौरान संशोधकों को इस प्रजाति की छाती के किनारे एक ही आड़ी लकीर मिली, जो इसे ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली प्रजाति से अलग करती है। इसके अलावा भारतीय प्रजाति का अंडे देने वाला अंग भी तुलना में छोटा है, और पंखों पर बने धब्बे का आकार भी अलग है।
इस नई प्रजाति को दिवंगत डॉ. टी. सी. नरेंद्रन के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने भारत में परजीवी गांधीलमक्खियों की रिसर्च में बड़ा योगदान दिया था। इसी सम्मान में इसका नाम 'ऑक्सिसर्फस नरेंद्रानी' रखा गया। इस खोज से पहले भारत में इस परिवार की सिर्फ आठ प्रजातियां ही दर्ज थीं।
संशोधकों का कहना है कि अगर देश के अलग-अलग इलाकों में इसी तरह का व्यापक सर्वे किया जाए, तो कीड़ों की जैव विविधता से जुड़ी और भी कई अनजान प्रजातियां सामने आ सकती हैं।