सातारा जिला बैंक चुनाव: तीन उम्मीदवारों पर अदालती फैसला, 21 अक्टूबर पर नजर
सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव में तीन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी पर अदालती फैसले के बाद दस संचालकों की पात्रता को लेकर चर्चा तेज है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव में सत्ता के समीकरण बैठाने की कोशिशें चल रही थीं कि इसी बीच अदालत के एक फैसले ने उम्मीदवारों की पात्रता का मुद्दा फिर से चर्चा में ला दिया है। राजेंद्र राजपुरे, रूपाली राजपुरे और अनिल देसाई की उम्मीदवारी से जुड़ी अदालती कार्यवाही के बाद चुनाव की राजनीतिक हलचल को नया मोड़ मिलने की संभावना बनी है। खास तौर पर दस संचालकों की उम्मीदवारी को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद अलग-अलग राजनीतिक गुटों की नजर अब कानूनी पहलुओं पर टिकी है।
बैंक के चुनाव में नामांकन पत्रों की जांच के बाद उम्मीदवारी की वैधता पर विवाद खड़ा हुआ था। राजेंद्र और रूपाली राजपुरे की उम्मीदवारी को संजय मोरे ने चुनौती दी थी, जबकि अनिल देसाई की उम्मीदवारी को चंद्रकांत कोकाटे ने चुनौती दी थी। इन मामलों में उच्च न्यायालय की सुनवाई के बाद संबंधित उम्मीदवारों की उम्मीदवारी के खिलाफ फैसला आया, जिससे चुनाव की आगे की प्रक्रिया को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है।
इन मामलों में संचालक पद की पात्रता से जुड़े नियमों का सवाल उठा था। इसी वजह से दूसरे उम्मीदवारों की पात्रता को लेकर भी राजनीतिक हलकों में तरह-तरह के अंदाजे लगाए जा रहे हैं। सार्वजनिक निर्माण मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले, सांसद उदयनराजे भोसले, रामराजे नाईक-निंबाळकर, प्रदीप विधाते, नितीन काका और प्रभाकर घार्गे समेत अन्य संचालकों की उम्मीदवारी को लेकर भी बातें हो रही हैं।
हालांकि तीन उम्मीदवारों के मामलों में आए अदालती फैसले के आधार पर यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि बाकी उम्मीदवार अपात्र हो जाते हैं। हर उम्मीदवार की पात्रता, उस पर लागू होने वाले प्रावधान और अदालती आदेश का ठीक-ठीक दायरा अलग-अलग जांचना जरूरी है। इसलिए देखना अहम होगा कि यह चर्चा चुनाव से जुड़े असल फैसलों में कैसे बदलती है।
दस उम्मीदवारों की पात्रता पर अदालत ने एक साथ सवाल उठाया है, यह बात अभी साफ नहीं हुई है। संबंधित कानूनी प्रावधानों और हर उम्मीदवार की अलग स्थिति की जांच के बाद ही इस चर्चा की सच्चाई सामने आएगी। ऐसे में राजनीतिक हलकों के अंदाजे और आधिकारिक कानूनी स्थिति के बीच का फर्क अहम रहेगा।
21 अक्टूबर नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख है और वह नजदीक आ रही है। इसलिए कानूनी सलाह-मशविरे और राजनीतिक रणनीति में तेजी आने की संभावना है। संभावित आपत्तियां, उन पर कानूनी रुख और उम्मीदवारों के आगे के फैसले, इन्हीं पर चुनाव की तस्वीर निर्भर करेगी।
नामांकन वापसी की मियाद करीब आने से अलग-अलग गुटों की ओर से संभावित उम्मीदवारों की स्थिति परखी जा सकती है। अदालती फैसले का आगे की रणनीति पर क्या असर पड़ता है, इसका अंदाजा लगाकर राजनीतिक नेता कदम उठा सकते हैं। लेकिन इन घटनाओं से किस गुट को फायदा होगा या किसकी उम्मीदवारी मुश्किल में पड़ेगी, यह फिलहाल तय नहीं है। जिला बैंक की सत्ता के समीकरण बदलेंगे या नहीं, इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में साफ हो सकता है।