शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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भद्रावती के चार गांवों की सीमा पर बलिप्रतिपदा को गायगोधन और ढाल पूजा, गोंड गोवारी जमात का आयोजन

कल्चर PT24 टीम

निंबाळा, घोट, हेटी और चालबर्डी की सीमा पर मंगलवार को बलिप्रतिपदा के दिन आदिवासी गोंड गोवारी जमात गायगोधन (गोवर्धन पूजा) और ढाल पूजा करेगी।

भद्रावती तालुका के निंबाळा, घोट, हेटी और चालबर्डी, इन चार गांवों की सीमा पर बलिप्रतिपदा के दिन गायगोधन (गोवर्धन पूजा) और ढाल पूजा की जाती है। आदिवासी गोंड गोवारी जमात यह पूजा आज भी उसी श्रद्धा और पारंपरिक तरीके से करती है। इस साल यह आयोजन मंगलवार को बलिप्रतिपदा के दिन रखा गया है।

आसपास के करीब 10 से 12 गांवों के कोपाल, यानी गायें चराने वाले, अपनी गायों को पूजा के लिए यहां लेकर आते हैं। इन गांवों में चपराडा, चालबर्डी, घोट, निंबाळा, हेटी, लोणारा (गोंड), लोणारा (पारखी), कचराळा, मानोरा, मोहबाळा और दूसरे गांव शामिल हैं। जानकारों के मुताबिक यह परंपरा करीब चार सौ साल से भी पुरानी है और आज भी उतनी ही भक्ति से चल रही है। गायें चराना गोंड गोवारी जमात का पारंपरिक काम है, इसलिए ये लोग गायों की पूजा करके उनके प्रति कृतज्ञता जताते हैं।

यह उत्सव दीपावली के चौथे दिन, बलिप्रतिपदा को मनाया जाता है। सुबह पहले घर पर गायों की पूजा होती है। इसके बाद सार्वजनिक पूजा के लिए गायों को गायगोधन के मैदान में लाया जाता है।

इस मैदान पर आम तौर पर पच्चीस से तीस टोकरी गोबर से एक बड़ी भुरसी बनाई जाती है। गायगोधन पूजा में भुरसी की खास अहमियत है। उसमें एक अंडा और मुर्गी का एक छोटा जिंदा चूजा रखा जाता है। चूजे का धड़ गोबर में दबा रहता है और गर्दन वाला हिस्सा खुला रखा जाता है। अंडे और चूजे के चारों तरफ करीब एक फुट की ग्यारह काड़ियों से घेरा बनाया जाता है। ये काड़ियां पांच तरह के पेड़ों की होती हैं। उन पर गुलाबी रंग का रिबन लपेटा जाता है और जैसे किसी सुहागन की गोद भरी जाती है, वैसे ही चोली के कपड़े और नारियल से भुरसी की गोद भरी जाती है।

इसी मौके पर जमात के लोग अपने देवता माने जाने वाली ढाल की पूजा करते हैं। बीस से पच्चीस फुट लंबी लाठी पर लकड़ी का पटरा बिठाकर ढाल बनाई जाती है। एक ढाल चार मुख वाली होती है, जो माता रायताड जंगो का प्रतीक यानी स्त्री रूप की है। दूसरी ढाल दो मुख वाली होती है, जो धर्मगुरु पहांदि पारी कुपार लिंगो का प्रतीक यानी पुरुष रूप की है।

दोनों ढालों की आश्विन दशमी को गोंगो (पूजा) की जाती है। मैदान पर, जहां गायगोधन बनाया जाता है, वहां खिल्ला मुठवा पेन की पूजा होती है। हिंदू धर्म में जिस दिन लक्ष्मी पूजन होता है, उसके एक दिन पहले गोंड गोवारी जमात महिषासुर (बोदालपेन)/भेसासुर, खैरदाई/मातामाय, ठाकूर देव और अपने पूर्वजों की मुठपूजा करती है। पेनकारण (उतरण) किए गए पूर्वज भी इसमें शामिल हैं। फिर गांव की गायों को गोधन के ऊपर से चलाकर खिल्ला मुठवा देव के दर्शन कराए जाते हैं। यह परंपरा अनादि काल से चली आ रही है और इसी से इस दिन उत्सव मनाने का रिवाज बना। इसीलिए जमात आज भी माता रायताड जंगो और पहांदी पारी कुपार लिंगो के प्रतीक के तौर पर स्त्री और पुरुष रूप की ढालें (सल्ला और गांगरा) पूजती है। इन्हें जंगो लिंगो लाठी गोंगो भी कहा जाता है। आज के दिन से देव माई नाम के धार्मिक मुठपूजा के त्योहार के आने तक इन दोनों ढालों की मान्यता रखी जाती है।

इसके बाद गायगोधन पूजा शुरू होती है। जमात की प्रथा के हिसाब से पहले चारों गांवों की सीमा की और सीमा में बसे देवताओं की पूजा होती है। इस पूजा को 'शिव बांधना' कहते हैं। फिर मैदान के पास जमात के आराध्य देवता वाघोबा की मूर्ति की पूजा की जाती है। आदिवासी परंपरा से पूजा करके और नारियल फोड़कर भुरसी की पूजा होती है। उसके बाद अंडे और जिंदा चूजे वाली भुरसी के ऊपर से गायों के झुंड को छोड़ा जाता है। फिर चूजे और अंडे को भुरसी से बाहर निकाला जाता है। यहां के लोगों का दावा है कि अंडे और चूजे को चोट पहुंच ही नहीं सकती, और निकालने पर उन्हें चोट नहीं लगी होती।

जमात का कहना है कि गोंड गोवारी जमात और गायगोधन व ढाल पूजा का वजूद बना रहे, इसलिए हर साल बलिप्रतिपदा को यह पूजा होती है। विदर्भ के कई जिलों में गांव स्तर पर और सामूहिक तरीके से गायगोधन व ढाल पूजन का कार्यक्रम होता है।

अनुसूचित जनजाति की सूची में क्रमांक 18 पर दर्ज आदिवासी गोंड गोवारी जमात को अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र और वैधता प्रमाणपत्र मिलने में अड़चनें आ रही हैं। आदिवासी गोंड गोवारी संस्कृति व कल्याण मंडल, जिला चंद्रपुर के उपाध्यक्ष विलास राऊत ने अपील की है कि जिले और विदर्भ के जनप्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी इस जमात की सांस्कृतिक विरासत और परंपरा को देखें, ताकि अनुसूचित जनजाति के लाभ और प्रमाणपत्र मिलने का रास्ता आसान हो।

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