अलग-अलग राज्यों में अलग तरह से मनती है धनत्रयोदशी, महाराष्ट्र से दक्षिण भारत तक के रिवाज
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आश्विन कृष्ण त्रयोदशी पर महाराष्ट्र, उत्तर भारत, गुजरात, दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और राजस्थान में अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं।
दिवाली की शुरुआत धनत्रयोदशी से होती है। उत्तर भारत में इसे धनतेरस भी कहा जाता है। यह त्योहार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को पड़ता है। इसे सिर्फ दौलत और खुशहाली का नहीं, बल्कि अच्छी सेहत और लंबी उम्र का भी त्योहार माना जाता है।
देश में अलग-अलग इलाकों के तौर-तरीके एक जैसे नहीं हैं। हर राज्य में इस दिन की अपनी परंपरा है। आइए राज्य दर राज्य देखते हैं कि यह दिन कैसे मनाया जाता है।
महाराष्ट्र में इस दिन खास तौर पर भगवान धन्वंतरी की पूजा होती है। उन्हें आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य कहा गया है। लोगों की सेहत अच्छी रहे, इसलिए यह दिन बहुत अहम माना जाता है। कई घरों में सोने-चांदी के गहने या नए सिक्के साफ धोकर पूजा में रखे जाते हैं। व्यापारी अपनी तिजोरी की पूजा करते हैं। यहां धनिया और गुड़ को मिलाकर उसका नैवेद्य चढ़ाने की खास परंपरा है। आरोग्य के प्रतीक के तौर पर नीम के पत्तों का रस या पत्ते भी खाए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब में यह त्योहार धनतेरस के नाम से बहुत बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। यहां इसे माता लक्ष्मी और कुबेर के स्वागत से जोड़ा गया है। इस दिन तांबे, पीतल या स्टील के नए बर्तन, सोने-चांदी के गहने, झाड़ू या इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। बाजार देर रात तक रोशनी से जगमगाते रहते हैं। शाम को घर के मुख्य दरवाजे के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके चार बत्तियों वाला बड़ा दिया जलाया जाता है। इसे चौमुखी दिया या यमदीपदान कहते हैं। मकसद यह है कि परिवार में किसी की अकाल मृत्यु न हो।
गुजरात निवेश और कारोबार के लिए जाना जाता है। वहां धनत्रयोदशी को आर्थिक साल की अच्छी शुरुआत का वक्त माना जाता है। व्यापारी और कारोबारी इस दिन नई बही-खाता किताबें (Chopda) पूजा के लिए लाते हैं और उन पर लक्ष्मी माता के प्रतीक के रूप में स्वस्तिक बनाते हैं। गुजराती परिवार आंगन में सुंदर रंगोली बनाते हैं और पूरे घर को दियों से सजाकर लक्ष्मी के आने का इंतजार करते हैं।
दक्षिण भारत में धनत्रयोदशी को धन्वंतरी जयंती के रूप में मनाया जाता है और धार्मिक के साथ-साथ चिकित्सा के नजरिए से भी इसकी अहमियत ज्यादा है। तमिलनाडु में सुबह घर के सब लोग इकट्ठा होकर कई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, गुड़ और घी से बनी खास दवा (Lehyam/Marundu) लेते हैं। उनकी आस्था है कि इससे साल भर सेहत अच्छी रहती है। घर पूरी तरह साफ किए जाते हैं और देवघर में धन्वंतरी देव की तस्वीर के सामने दिये जलाए जाते हैं।
पूर्वी भारत में तरीका थोड़ा अलग है। बंगाल में दिवाली के दौरान काली पूजा का महत्व ज्यादा है, फिर भी धनत्रयोदशी पर वहां यमदीपदान जरूर किया जाता है। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इस दिन रात को घर के आसपास और तुलसी के पास 13 मिट्टी के दिये जलाने की प्रथा है। कुछ इलाकों में पूर्वजों की आत्मा को रास्ता दिखाने के लिए ऊंचे बांस पर आकाशदीप (कंदील या दिया) टांगा जाता है।
राजस्थान के गांवों में यह दिन प्रकृति और पशुधन से जुड़ा है। यहां गाय और बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है, क्योंकि उन्हें असली दौलत माना जाता है। पानी की अहमियत बताने के लिए महिलाएं गांव के कुएं या पानी के स्रोत की पूजा करती हैं और वहां दिया जलाती हैं।
रीति-रिवाज राज्य के हिसाब से बदलते हैं, पर धनत्रयोदशी का बुनियादी संदेश पूरे देश में एक ही है: "आरोग्य ही असली संपत्ति है"।
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