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रविवार, 8 नवंबर 2026

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अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं ने ट्रम्प की पार्टी के खिलाफ क्यों डाले वोट

सियासत PT24 टीम

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के सर्वे के मुताबिक भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी की वजह महंगाई, नौकरी, H-1B नियम और भेदभाव हैं, भारत से जुड़ी नीति नहीं।

अमेरिका की राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की अहमियत लगातार बढ़ रही है। हाल के चुनावों में इस समुदाय के मतदाताओं ने रिपब्लिकन पार्टी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों से अपनी गहरी नाराजगी जताते हुए उनके खिलाफ वोट डाला। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस (Carnegie Endowment for International Peace) के 'इंडियन अमेरिकन एटीट्यूड्स सर्वे' से इस बदलाव के कई कारण सामने आए हैं।

अमेरिकन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर सुमित्रा बद्रीनाथन अमेरिका में वोट डालने के तौर-तरीकों का गहराई से अध्ययन करती हैं। उनके मुताबिक भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का यह गुस्सा किसी विदेश नीति या भारत के प्रति अमेरिका के रुख की वजह से नहीं है। उनका कहना है कि यह मुख्य रूप से अमेरिका की स्थानीय आर्थिक समस्याओं और ट्रम्प प्रशासन की सख्त नीतियों से पैदा हुआ है।

प्रोफेसर बद्रीनाथन और साउथ एशिया कार्यक्रम के निदेशक मिलन वैष्णव ने यह सर्वे किया। इसके अनुसार भारतीय-अमेरिकी नागरिक वोट डालते समय रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे देखते हैं। आम अमेरिकी मतदाताओं की तरह वे नौकरियों के मौके, देश की अर्थव्यवस्था और रहने के बढ़ते खर्च (Cost of Living) को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं। ट्रम्प प्रशासन के दौरान आर्थिक उतार-चढ़ाव, बढ़ती महंगाई और बाजार की अनिश्चितता से कई भारतीय-अमेरिकी परिवारों का बजट बिगड़ गया। आर्थिक स्थिरता की तलाश में इस समुदाय ने ट्रम्प की अगुवाई वाली रिपब्लिकन पार्टी से दूरी बनाना बेहतर समझा।

इस समुदाय के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात ट्रम्प प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीतियां रहीं। खासकर H-1B वीजा के नियमों में किए गए बदलाव, टैरिफ और भारतीयों को अमेरिका में काम करते हुए आने वाली प्रशासनिक दिक्कतों से टेक्नोलॉजी सेक्टर के और ज्यादा पढ़े-लिखे युवाओं में भारी असंतोष फैला। ट्रम्प की सख्त इमिग्रेशन नीतियों के बावजूद भारतीय नागरिकों के लिए पढ़ाई और करियर के लिहाज से अमेरिका को यूरोपीय देशों से बेहतर विकल्प माना जाता है। फिर भी इन नीतियों से खड़ी हुई चुनौतियों ने मतदाताओं को रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ रुख अपनाने पर मजबूर किया।

अक्सर माना जाता है कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय वोट डालते समय भारत के प्रति अमेरिकी नीतियों का ख्याल रखते हैं। कार्नेगी के सर्वे से यह धारणा पूरी तरह गलत निकली। प्रोफेसर सुमित्रा बद्रीनाथन ने साफ कहा, "हमने भारतीय-अमेरिकी लोगों से लगातार पूछा है कि क्या वे अपने राजनीतिक नेताओं के भारत के प्रति नजरिए पर ध्यान देते हैं, और जवाब हमेशा 'नहीं' ही आया है।" इससे जाहिर होता है कि अमेरिका में बसा भारतीय समुदाय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बजाय अपने भविष्य, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार जैसे स्थानीय मुद्दों पर वोट देता है।

अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी नागरिकों को आज भी बड़े पैमाने पर भेदभाव झेलना पड़ता है। हर दो में से एक भारतीय यानी करीब 50 प्रतिशत लोगों को अपनी त्वचा के रंग या मूल वंश की वजह से किसी न किसी तरह के भेदभाव या नस्लवाद का सामना करना पड़ता है। टेक्सास जैसे राज्य में, जहां भारतीय-अमेरिकी लोगों की संख्या दूसरे नंबर पर है, राजनीतिक प्रचार में भारत विरोधी भावनाओं का इस्तेमाल दिखा। रिपब्लिकन नेताओं के बयानों और सोशल मीडिया पर नफरत भरी भाषा से भारतीय समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा हुई, जिसका सीधा असर वोटिंग के नतीजों पर दिखा।

भारतीय-अमेरिकी मतदाता अब किसी एक पार्टी से बंधा नहीं रहा। ऐतिहासिक रूप से यह समुदाय डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ ज्यादा झुका रहा है, लेकिन वह अपने अधिकारों और आर्थिक हितों को लेकर काफी जागरूक है। ट्रम्प की नीतियों के खिलाफ जाहिर हुआ यह गुस्सा आने वाले समय में अमेरिकी राजनीति की दिशा बदल सकता है।

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