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17:21 IST

अमेरिका ने इन्फोसिस, TCS, विप्रो समेत 8 कंपनियों को PERM ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से बाहर किया

अमेरिकी श्रम विभाग ने भारतीय आईटी कंपनियों के साथ माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी को भी PERM से निलंबित किया है। उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर गंभीर आरोप लगाए।

अमेरिका ने इन्फोसिस, TCS, विप्रो समेत 8 कंपनियों को PERM ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से बाहर किया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

अमेरिका में काम कर रहे और ग्रीन कार्ड का इंतज़ार कर रहे हज़ारों भारतीय आईटी कर्मचारियों के लिए बुरी खबर आई है। अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labor) ने इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (TCS), विप्रो, कॉग्निज़ेंट, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़े "परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम" (PERM) से निलंबित कर दिया है। इनके साथ माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी भी इस कार्रवाई की ज़द में आई हैं। इस फैसले से आईटी सेक्टर में हलचल मच गई है।

PERM है क्या, पहले यह समझ लें। अमेरिका में नौकरी के आधार पर ग्रीन कार्ड, यानी स्थायी रहने का हक, लेना हो तो PERM सबसे पहला और अहम पड़ाव माना जाता है। कोई भी कंपनी अपने विदेशी कर्मचारी के लिए ग्रीन कार्ड का आवेदन तभी दे सकती है, जब अमेरिकी श्रम विभाग से उसे प्रमाणपत्र मिल जाए।

इस प्रमाणपत्र के लिए कंपनी को कानूनी तौर पर साबित करना होता है कि उस पद के लिए कोई योग्य और इच्छुक अमेरिकी कामगार मौजूद नहीं है। श्रम विभाग यह दावा जाँचकर मंज़ूरी देता है, तभी विदेशी कर्मचारी के ग्रीन कार्ड आवेदन की अगली कार्रवाई शुरू होती है। अब इन 8 कंपनियों को ही प्रोग्राम से बाहर कर दिया गया है, इसलिए उनके ज़रिए जाने वाले सारे नए आवेदन रुक जाएँगे।

उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस ने अमेरिकी एंटी-फ्रॉड टास्क फोर्स की अगुवाई करते हुए टेक कंपनियों के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए। खासकर माइक्रोसॉफ्ट को निशाना बनाते हुए उन्होंने दावा किया कि कंपनी ने 2025 में करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला। इसके बावजूद उन पदों के लिए योग्य अमेरिकी कामगार न होने का प्रमाण देकर कंपनी ने विदेशी कामगारों को तरजीह दी।

वांस ने अपने बयान में कहा कि जारी जाँच की वजह से माइक्रोसॉफ्ट के लिए PERM प्रोग्राम निलंबित किया गया है, यानी अब वह H-1B वाले कर्मचारियों को अमेरिका में स्थायी निवासी बनाने के लिए आवेदन नहीं कर पाएगी। उनके शब्दों में, "आप अमेरिकी कामगारों को निकालकर उनकी जगह विदेशी बंधुआ मज़दूर नहीं रख सकते।" उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका चाहता है कि कंपनियाँ यहाँ निवेश करें और बढ़ें, लेकिन नौकरियाँ अमेरिकी कामगारों को दें।

वांस के मुताबिक 6,000 स्थानीय कामगारों को निकालने के बाद भी माइक्रोसॉफ्ट को 6,000 से ज़्यादा H-1B वीज़ा मंज़ूर हुए और 3,682 ग्रीन कार्ड आवेदन दिए गए। इनमें से लगभग 1,000 आवेदन ऐसे पदों के लिए थे, जिन पर पहले अमेरिकी नागरिक काम करते थे। उनका आरोप है कि H-1B वीज़ा का असली मकसद बेहद कुशल विदेशी कामगारों को लाना था, लेकिन अब इस व्यवस्था में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और गड़बड़ी हुई है।

कार्रवाई सिर्फ आईटी कंपनियों तक सीमित नहीं है। श्रम विभाग ने हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड जैसी दुनिया की 9 नामी यूनिवर्सिटियों को भी जाँच के दायरे में लिया है। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि इन यूनिवर्सिटियों ने अमेरिकी कर्मचारियों की तनख्वाह कम रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों को नौकरी देने को तरजीह दी। श्रम विभाग के महानिरीक्षक एंथनी डी'एस्पोसिटो ने बताया कि नियम तोड़ने के मामले में इन संस्थाओं को समन भेजे गए हैं।

भारतीय आईटी पेशेवरों पर सबसे सीधा असर पड़ेगा। जिनके ग्रीन कार्ड आवेदन अभी PERM स्तर पर पेंडिंग हैं, उनकी प्रक्रिया पूरी तरह अटकने का डर है और नई मंज़ूरियों में भारी देरी और अनिश्चितता झेलनी पड़ सकती है। हालाँकि जानकारों के मुताबिक किसी कंपनी के निलंबित होने का मतलब यह नहीं कि उसके कर्मचारियों को पहले मिल चुके ग्रीन कार्ड अपने आप रद्द हो जाएँगे। असर मुख्य रूप से आगे के नए आवेदनों और अभी लंबित मंज़ूरियों पर पड़ेगा।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस सख्ती का मकसद अमेरिकी कामगारों के रोज़गार और आर्थिक हितों की रक्षा करना है। सरकार ने चेतावनी दी है कि स्थानीय कामगारों की जगह सस्ते विदेशी कामगारों को तरजीह नहीं दी जाएगी और देश के सभी रोज़गार कानूनों का सख्ती से पालन होगा। इससे संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में अमेरिका के वीज़ा और ग्रीन कार्ड नियम और कड़े हो सकते हैं।

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