अल निनो की मार से कोकण के हापूस पर संकट, रत्नागिरी के आम बागवान चिंता में
कम बारिश, अक्टूबर की तेज गर्मी और आठ महीने तक उन्हीं हालात के अंदाज ने कोकण के आम उत्पादकों की फिक्र बढ़ा दी है।
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कोंकण का जगप्रसिद्ध हापूस आम एक बार फिर मौसम की मार झेलने जा रहा है। रत्नागिरी के आम बागवानों को डर है कि मौसम के लगातार बदलते मिजाज का असर इस बार भी उनकी पैदावार पर पड़ेगा। पिछले कई साल से हापूस की उत्पादकता लगातार घटती दिख रही है।
इस साल बारिश बहुत कम हुई, इसलिए सितंबर से ही बागवानों को अक्टूबर की तेज गर्मी की झुलस सहनी पड़ रही है। ऊपर से मौसम विशेषज्ञों ने अल निनो के असर से इस बार ठंड गायब रहने और अगले पूरे आठ महीने गर्मी ही रहने का अंदाज जताया है। इससे आम बागवान बुरी तरह घबरा गए हैं।
कोंकण की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा में हापूस का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन 2009 में आए फयान तूफान के बाद से यह फसल एक के बाद एक संकट में फंसती चली आ रही है। हर साल किसी न किसी प्राकृतिक आपदा में यह मुख्य फसल बर्बाद होती दिखती है।
पिछले साल फूल खूब आए थे, मगर कड़ाके की ठंड की वजह से बौर काला पड़ गया। इस साल अल निनो के असर से बारिश बहुत कम हुई, जिसके चलते रत्नागिरी समेत तीन तहसील सूखाग्रस्त घोषित किए गए हैं। मौसम में इतनी विषमता आ गई है कि सिर्फ तीन-चार किलोमीटर के फासले पर अलग-अलग और अजीब मौसम देखने को मिल रहा है।
इसी साल की शुरुआत में, यानी मार्च 2026 के सीजन में भी बेमौसम बारिश, गर्मी की लहरों और फुदका रोग की वजह से हापूस का उत्पादन करीब 80 से 90 प्रतिशत तक घट गया था। अब कम बारिश और बढ़ते तापमान के कारण लगातार दूसरी बार अगले सीजन की फसल पर संकट आ गया है। यह फसल 2027 की शुरुआत में आने वाली है।
बागों की मौजूदा हालत देखें तो पिछले साल जिन पेड़ों पर बौर आया था, वहां नई कोंपलें फूटी हैं, जबकि जिन पर बौर नहीं आया था वे पेड़ हरे-भरे दिख रहे हैं। मगर इन नई कोंपलों पर फुदका कीड़े का भारी प्रकोप दिखाई दे रहा है।
इस कीड़े से पेड़ों को बचाने के लिए बागवानों को महंगी कीटनाशक दवाओं का बार-बार छिड़काव करना पड़ रहा है, जिससे खर्च का बोझ काफी बढ़ गया है। बागवानों का कहना है कि अक्टूबर की गर्मी के बाद अगर ठंड वक्त पर और ठीक से शुरू हो जाए, तभी इन पेड़ों में सही ढंग से फूल आने की उम्मीद है।
लेकिन इस बार ठंड की अवधि कम और तापमान ज्यादा रहने का अंदाज है, इसलिए हापूस की पैदावार पर गंभीर असर पड़ेगा। जमीन में पानी की कमी और गर्मी की वजह से आए हुए बौर के झड़ जाने का गहरा डर भी बना हुआ है। आम बागवान इस वक्त आर्थिक संकट में फंस गए हैं।