24 अक्टूबर को पोलिओ दिवस: भारत ने कैसे पोलिओ को हराया, दो बूंद ज़िंदगी की का सफर
विश्व पोलिओ दिवस पर भारत की पोलिओमुक्ति की कहानी और नियमित टीकाकरण की अहमियत।
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हर साल 24 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व पोलिओ दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक बीमारी को याद करने के लिए नहीं है। इसका मकसद उन मेडिकल खोजों और हेल्थ वर्कर्स की कुर्बानी का सम्मान करना है, जिन्होंने दुनिया भर के लाखों बच्चों को अपंगता के साए से बाहर निकाला।
इस दिन की शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और रोटरी इंटरनेशनल ने मिलकर की थी। 24 अक्टूबर की तारीख चुनने की एक खास वजह है। पोलिओ के खिलाफ पहली असरदार वैक्सीन खोजने वाले बड़े वैज्ञानिक डॉ. जोनास साल्क (Dr. Jonas Salk) की यह जयंती है। उनकी खोज की बदौलत आज दुनिया भर में पोलिओ के मामले 99 फीसदी से ज़्यादा घट चुके हैं।
पोलिओ, यानी पोलिओमायलायटिस (Poliomyelitis), बेहद छूत वाली और खतरनाक वायरस से फैलने वाली बीमारी है। यह वायरस ज़्यादातर छोटे बच्चों के नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। कुछ ही घंटों में शरीर की मांसपेशियां कमज़ोर पड़ सकती हैं और बच्चे को हमेशा के लिए अपंगता हो सकती है। कुछ गंभीर मामलों में सांस लेने वाली मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं, जिससे मरीज़ की जान भी जा सकती है। गंदे पानी, खाने और गंदगी की वजह से यह वायरस तेज़ी से फैलता है।
इस बीमारी का कोई पक्का मेडिकल इलाज मौजूद नहीं है, इसलिए रोकथाम ही एकमात्र उपाय है। पोलिओ की वैक्सीन (OPV और IPV) ही बच्चों के लिए अकेली सुरक्षित ढाल है।
भारत का पोलिओमुक्ति का सफर पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा और बेमिसाल मिसाल है। नब्बे के दशक में भारत में हर साल लाखों बच्चे पोलिओ की चपेट में आते थे। घनी आबादी, अलग-अलग भौगोलिक हालात और गंदगी जैसी चुनौतियों की वजह से देश से पोलिओ मिटाना लगभग नामुमकिन माना जाता था। लेकिन भारत सरकार की शुरू की हुई पल्स पोलिओ मुहिम (Pulse Polio Campaign), हेल्थ वर्कर्स, आंगनवाड़ी सेविकाओं और लाखों वालंटियर्स की दिन-रात की मेहनत से भारत ने यह नामुमकिन लक्ष्य मुमकिन कर दिखाया।
"दो बूंद ज़िंदगी की" का नारा देश के हर घर तक पहुंच गया। सार्वजनिक जगहों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और दूर-दराज़ के इलाकों में जाकर हेल्थ वर्कर्स ने बच्चों को पोलिओ की खुराक पिलाई। इसी बड़ी कोशिश का नतीजा रहा कि भारत में पोलिओ का आखिरी मरीज़ 13 जनवरी 2011 को दर्ज हुआ।
उसके बाद लगातार तीन साल तक एक भी नया मरीज़ नहीं मिला। इसके बाद मार्च 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को आधिकारिक तौर पर पोलिओमुक्त देश घोषित कर दिया। इस जीत को भारत के सेहत के इतिहास का सबसे सुनहरा अध्याय माना जाता है।
भारत ने भले ही पोलिओ पर कामयाबी पा ली हो, लेकिन दुनिया के स्तर पर पूरी तरह पोलिओमुक्त होने का लक्ष्य अभी बाकी है। जब तक दुनिया के किसी भी एक देश में पोलिओ का वायरस मौजूद है, तब तक दूसरे देशों के बच्चों पर भी इसका खतरा खारिज नहीं किया जा सकता।
इसी वजह से विश्व पोलिओ दिन के मौके पर हर साल नियमित टीकाकरण की अहमियत पर ज़ोर दिया जाता है। माता-पिता के लिए ज़रूरी है कि वे अपने छोटे बच्चों को उम्र के हिसाब से पोलिओ की सारी खुराकें वक्त पर दिलवाएं, ताकि यह वायरस दोबारा सिर न उठा सके।
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