11 साल की उम्र में लिवर ट्रांसप्लांट, 19 साल बाद जसलोक में दूसरा सफल ऑपरेशन
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मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने 30 साल के जितिन शिर्के का दूसरा लिवर ट्रांसप्लांट कामयाबी से किया है। उनका पहला ट्रांसप्लांट दिसंबर 2007 में हुआ था, यानी करीब 19 साल पहले। बचपन में जितिन को ऑटोइम्यून सिरोसिस की बीमारी निकली थी और 11 साल की उम्र में उनका पहला लिवर ट्रांसप्लांट किया गया था।
वह पहला ऑपरेशन मुंबई के एक दूसरे अस्पताल में उस वक्त के सीनियर लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. एस. के. माथुर ने किया था। तब जितिन के पिता ने अपने लिवर का बायां आधा हिस्सा दान किया था। इसके बाद जितिन अपना करियर बनाते हुए आम रोजमर्रा की जिंदगी में लौट आए थे।
फरवरी 2026 के बीच से उनके सामने लिवर की एक और जानलेवा दिक्कत खड़ी हो गई। पहले से लगाए गए लिवर को शरीर ने नकार दिया, जिसे रिफ्रैक्टरी क्रॉनिक रिजेक्शन कहा गया है। इसी वजह से दूसरे ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ी।
फरवरी 2026 में नियमित ब्लड टेस्ट में अचानक सामने आया कि जितिन के लिवर का काम बहुत बिगड़ गया है। कई जांचों और इलाज के बावजूद उनकी तबीयत गिरती चली गई। तब उन्होंने जसलोक हॉस्पिटल की गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी की चीफ हेपेटोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. आभा नागराल से सेकंड ओपिनियन लिया। डॉ. नागराल पहले ट्रांसप्लांट के बाद जितिन की केयर टीम का हिस्सा रही थीं। मेडिकल हिस्ट्री देखने और इलाज के विकल्पों पर सोचने के बाद टीम ने दूसरे ट्रांसप्लांट के लिए उनका मूल्यांकन किया।
जून के आखिर में जितिन के शरीर में अमोनिया का स्तर खतरनाक तरीके से बढ़ गया और वह बेहोश हो गए। उन्हें फौरन अस्पताल के आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। लिवर का काम बहुत ज्यादा गिर जाने पर टीम ने ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया तेज कर दी। उनकी मां का लिवर ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त पाया गया और 5 जुलाई 2026 को ऑपरेशन कामयाबी से हुआ। मां ने अपने लिवर का दायां आधा हिस्सा दान किया। अस्पताल के मुताबिक जितिन की सेहत अब सुधर रही है और वह काम पर लौट आए हैं।
जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी डायरेक्टर डॉ. आभा नागराल ने कहा, "जितिन का यह सफर ट्रांसप्लांट किए गए लिवर की लंबे समय तक देखभाल की पेचीदगियां दिखाता है। मेडिकल इलाज के बाद भी उनकी सेहत बिगड़ी, तब दूसरा ट्रांसप्लांट करना जरूरी हो गया। इस केस से पता चलता है कि ट्रांसप्लांट के बाद उम्र भर दवाइयां लेना, नियमित फॉलो-अप और वक्त पर मेडिकल दखल बेहद अहम है।"
अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट सर्जरी के कंसल्टेंट डॉ. अमित रस्तोगी ने कहा, "दूसरा लिवर ट्रांसप्लांट खासकर तब, जब मरीज गंभीर रूप से बीमार हो, टेक्निकल और क्लिनिकल दोनों नजरिए से बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। जितिन का कामयाब ट्रांसप्लांट ट्रांसप्लांट, सर्जिकल और क्रिटिकल-केयर टीमों के सटीक प्लान और करीबी तालमेल का नतीजा है। अपने लिवर का एक हिस्सा देने का उनकी मां का फैसला इस सर्जरी को मुमकिन बनाने में अहम रहा।"
डॉ. एस. के. माथुर, अध्यक्ष, झेडटीसीसी ने कहा, "जितिन के सफर से दिखता है कि अंगदान जिंदगी बदल सकता है और जान बचा सकता है। मैंने 11 साल की उम्र में उनका पहला ट्रांसप्लांट किया था, जब उनके पिता बेहद कठिन आर्थिक दौर से गुजरते हुए भी लिवर का हिस्सा देने के लिए आगे आए थे। 2007 में बहुत कम अस्पताल लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट कर रहे थे। सही जीवित डोनर मिलना और वक्त पर ट्रांसप्लांट की सुविधा मिलना जरूरी है, फिर भी ऐसे मामलों में लिवर का दोबारा ट्रांसप्लांट करने का सर्जिकल हुनर और अनुभवी हेपेटोलॉजिस्ट व इंटेंसिविस्ट का होना कामयाबी के लिए बेहद अहम होता है। जीवित डोनरों पर निर्भरता घटाने के लिए ब्रेन स्टेम डेथ यानी मस्तिष्क मृत होने के बाद अंगदान को लेकर और जागरूकता लाने की जरूरत है।"
जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के सीईओ जितेंद्र हरियाण ने कहा, "जितिन का सफर पेचीदा मेडिकल केसों में क्लिनिकल हुनर, अलग-अलग विभागों के सहयोग और मरीज की लगातार देखभाल की अहमियत दिखाता है। उनकी मदद के लिए एकजुट होकर कोशिश करने वाली सभी टीमों पर हमें गर्व है। साथ ही उनके माता-पिता ने जो असाधारण उदारता और त्याग दिखाया, उसके लिए हम दिल से आभारी हैं।"
अस्पताल के मुताबिक जितिन की सेहत में आए सुधार के पीछे हेपेटोलॉजी, एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर, नर्सिंग और दूसरी क्लिनिकल सेवाओं के विशेषज्ञों के साथ जसलोक की ट्रांसप्लांट और सर्जिकल टीमों की मिली-जुली कोशिश रही।
पहले और दूसरे दोनों लिवर ट्रांसप्लांट करा चुके जितिन शिर्के ने कहा, "इस मुश्किल वक्त में मेरी देखभाल करने, सही मार्गदर्शन देने और हर कदम पर साथ देने के लिए मैं डॉ. आभा नागराल, डॉ. एस. के. माथुर, डॉ. अमित रस्तोगी और जसलोक हॉस्पिटल की पूरी टीम का दिल से शुक्रगुजार हूं। मेरी सेहत सुधारने के लिए दिन-रात कोशिश करने वाले ट्रांसप्लांट सर्जन, क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट, नर्स और बाकी सभी का भी मैं दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। मेरी जान बचाने के लिए अपने लिवर का हिस्सा देने वाले माता-पिता का और हर पल मेरे साथ रहने वाली मेरी होने वाली पत्नी का मैं हमेशा कर्जदार रहूंगा। परिवार के सहारे से मैं अब ठीक हो रहा हूं और फिर काम पर लौट रहा हूं, इसकी मुझे दिल से खुशी और कृतज्ञता है।"
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