1 नवंबर से बदल रहे कई नियम: मोबाइल कॉल पर नाम से LPG सिलेंडर तक असर
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नवंबर की शुरुआत के साथ कॉलिंग नेम डिस्प्ले, पेंशनर्स के लाइफ सर्टिफिकेट, LPG सिलेंडर के दाम, ITR की मियाद और FD से जुड़े बदलाव आम आदमी की जेब और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालेंगे।
अक्टूबर का महीना खत्म हो रहा है और 1 नवंबर से नया महीना शुरू हो रहा है। इसी के साथ आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी और जेब से जुड़े कई अहम नियम बदलने वाले हैं। LPG सिलेंडर की कीमत से लेकर मोबाइल कॉलिंग और पेंशनर्स के नियमों तक, कई बड़े बदलाव आ रहे हैं। आइए देखते हैं कि इनका क्या असर होगा।
सबसे पहले मोबाइल कॉल की बात। दूरसंचार विभाग (DoT) ने सभी टेलिकॉम कंपनियों को 1 नवंबर से 'CNAP' यानी कॉलिंग नेम प्रेजेंटेशन सेवा लागू करने के निर्देश दिए हैं। इस सुविधा के बाद मोबाइल पर आने वाले इनकमिंग कॉल पर कॉल करने वाले का असली नाम और नंबर दिखेगा। यह सेवा 4G और 5G नेटवर्क पर लागू होगी। इससे फ्रॉड करने वालों और स्पैम कॉल से बड़ी राहत मिलने में मदद होगी।
अब पेंशनर्स की बात। आम सरकारी पेंशनर्स के लिए 1 नवंबर से 30 नवंबर के बीच अपना 'जीवन प्रमाण पत्र' यानी लाइफ सर्टिफिकेट जमा करना जरूरी होता है। अगर यह प्रमाणपत्र वक्त पर जमा नहीं हुआ, तो पेंशन बंद हो सकती है। 80 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गों के लिए यह सुविधा 1 अक्टूबर से ही शुरू हो चुकी है। पेंशनर्स चाहें तो घर बैठे मोबाइल के जरिए भी यह प्रमाणपत्र आसानी से जमा कर सकते हैं।
LPG सिलेंडर के दाम भी हर महीने की पहली तारीख को बदलते हैं। सरकारी तेल कंपनियां इन कीमतों को नए सिरे से तय करती हैं। 1 नवंबर को घरेलू और कमर्शियल, दोनों सिलेंडरों के नए दाम जारी किए जाएंगे। पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी हुई है। इसे देखते हुए कमर्शियल सिलेंडर के दाम में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
टैक्स के मोर्चे पर GST काउंसिल की सिफारिश के मुताबिक करदाताओं के लिए रिटर्न भरने की प्रक्रिया आसान बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। टैक्स रिफंड की प्रक्रिया को ऑटोमेटेड करने की हलचल भी शुरू है। जिन करदाताओं के लिए टैक्स ऑडिट जरूरी है, उनके लिए वित्त वर्ष 2025-26 का ITR दाखिल करने की आखिरी तारीख बढ़ाकर 21 नवंबर 2026 कर दी गई है।
म्यूचुअल फंड और FD के नियमों में भी बदलाव की बात है। SEBI के नए नियमों के मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान को बाय-डिफॉल्ट ऑप्शन के तौर पर जोड़े जाने की संभावना है। इससे निवेशकों के लिए रेगुलर प्लान का खर्च समझना आसान हो जाएगा। इसके अलावा बैंक जरूरत के हिसाब से फिक्स डिपॉजिट (FD) की ब्याज दरों में भी बदलाव कर सकते हैं।
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