पुणे का पानी विवाद हाईकोर्ट पहुंचा, किसानों का आरोप: शहर ज्यादा पानी खींचता है, गंदा पानी छोड़ता है
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे महानगरपालिका और जल संसाधन विभाग को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई 17 दिसंबर को होगी।
पुणे के ग्रामीण इलाकों के किसानों का कहना है कि शहर उनका पानी पी रहा है और बदले में जहर लौटा रहा है। इसी शिकायत पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे महानगरपालिका (PMC) और जल संसाधन विभाग को नोटिस जारी किया है। यह जनहित याचिका है। इसमें आरोप है कि शहर तय सीमा से कहीं ज्यादा पानी लेता है और औद्योगिक रसायनों से मिला बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज नदियों और खेतों की नहरों में छोड़ देता है।
याचिका किसान विट्ठल जराड और ग्रामीण इलाकों के दूसरे प्रभावित किसानों ने दायर की है। उनका आरोप है कि महानगरपालिका शहर की जरूरतों को गांव की रोजी-रोटी से ऊपर रख रही है। कोर्ट ने दोनों पक्षों से कहा है कि अगली सुनवाई से पहले, यानी 17 दिसंबर तक, विस्तार से जवाब दाखिल करें।
याचिका के मुताबिक जल संसाधन विभाग ने पुणे शहर के लिए सालाना 13.5 TMC (हजार मिलियन घन फीट) पानी का कोटा तय किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शहर की आबादी अब 80 लाख से ऊपर है और PMC की मांग सालाना 20 TMC से आगे निकल गई है।
उनका दावा है कि PMC 10 प्रतिशत पानी कटौती लागू करने की बात करती है, लेकिन जमीन पर हाल कुछ और है। आरोप है कि निगम अपनी सीमा से रोजाना करीब 1,550 मिलियन लीटर (MLD) ज्यादा पानी ले रहा है।
किसानों ने याद दिलाया कि अगस्त 2017 में जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता ने PMC को निर्देश दिया था कि वह सत्यापित आबादी के आंकड़ों के हिसाब से पानी का इस्तेमाल सीमित रखे। उनका आरोप है कि महाराष्ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण (MWRRA) के बाद के निर्देशों के बावजूद ज्यादा पानी लेना जारी रहा। इसी वजह से उन्हें कोर्ट जाना पड़ा।
विवाद सिर्फ पानी की मात्रा का नहीं है। पुराने समझौतों के तहत PMC को शहर का सीवेज मुंढवा जैकवेल प्रोजेक्ट के जरिए ट्रीट करना था और उसके बाद ही पानी आगे सिंचाई के लिए छोड़ना था। याचिका का आरोप है कि इसकी जगह कच्चा सीवेज, औद्योगिक रसायनों के साथ, सीधे नदियों और खेतों की नालियों में छोड़ा जा रहा है। बताया गया है कि इस बदबूदार, रसायन वाले पानी से उपजाऊ जमीन का बड़ा हिस्सा खारा हो गया है और खेती लायक नहीं रहा। मौसमी फसलें बर्बाद हुईं और छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है।
कानूनी दबाव बढ़ने के बीच PMC ने पानी की बर्बादी रोकने के कुछ कदम उठाए हैं। अतिरिक्त महानगरपालिका आयुक्त पवनीत कौर ने आदेश जारी किया है कि निजी इमारतों के निर्माण और रेडी-मिक्स कंक्रीट (RMC) प्लांटों में पीने का पानी इस्तेमाल नहीं होगा। ऐसे कमर्शियल इस्तेमाल के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का ट्रीट किया हुआ पानी लेना अब जरूरी है।
आदेश लागू कराने के लिए निगम ने जुर्माने का ऐलान किया है। गैरकानूनी नल कनेक्शन पर 5,000 रुपये जुर्माना लगेगा और कनेक्शन तुरंत काट दिया जाएगा। छत की टंकी ओवरफ्लो होने पर 1,000 रुपये, पानी के कमर्शियल टैंकर से लीकेज होने पर 10,000 रुपये जुर्माना है। गुरुवार जैसे पानी कटौती वाले दिनों में वाहन धुलाई सेंटर या स्विमिंग पूल चलाने पर भी 10,000 रुपये का जुर्माना लगेगा।
यह मामला उस बढ़ते टकराव को दिखाता है जिसमें फैलते शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों के संसाधनों पर निर्भर हो जाते हैं। किसानों का कहना है कि सिंचाई के उनके पारंपरिक हक बिना उचित मुआवजे और पर्यावरण की सुरक्षा के छीने जा रहे हैं।
महाराष्ट्र भर के खेती से जुड़े संगठन इस केस पर नजर रखे हुए हैं। हाईकोर्ट का आखिरी फैसला राज्य में नगर निगमों की पानी के लिए जवाबदेही, आबादी से जुड़े कोटे और सीवेज ट्रीटमेंट की अनिवार्यता पर मिसाल बन सकता है।
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