पुणे: अरविंद शिंदे ने 500 करोड़ की कॉसमॉस बैंक एफडी और सफाई ठेके के विस्तार पर रोक मांगी
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पुणे महानगरपालिका की स्थायी समिति के दो फैसलों पर अरविंद शिंदे ने आयुक्त नवल किशोर राम को चिट्ठी लिखकर आपत्ति जताई है।
पुणे महानगरपालिका (PMC) के सदस्य अरविंद शिंदे ने निगम आयुक्त नवल किशोर राम से कहा है कि स्थायी समिति के दो फैसले वापस लिए जाएं। पहला फैसला कॉसमॉस को-ऑपरेटिव बैंक में 500 करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट और उस पर लोन का है। दूसरा फैसला सफाई ठेकों को दो साल बढ़ाने का है, जिस पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होंगे। मंगलवार की तारीख वाली चिट्ठियों में शिंदे ने लिखा है कि दोनों मामलों में सही प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई और दोनों से निगम की माली हालत को नुकसान हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा है कि बैंक डिपॉजिट पर दोबारा विचार नहीं हुआ तो वे अदालत जाएंगे।
शिंदे पहले कांग्रेस के दल नेता, विपक्ष के नेता और स्थायी समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने आयुक्त को दो अलग चिट्ठियां लिखीं। उनका कहना है कि प्रस्ताव स्थायी समिति से बिना ठीक से जांचे और बिना बोली मंगवाए पास करा लिए गए।
कॉसमॉस बैंक ने 29 सितंबर को आयुक्त को पत्र लिखकर कहा था कि PMC उसके यहां 500 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा की डिपॉजिट रखे। बैंक ने 16 महीने के लिए 7.40 फीसदी सालाना ब्याज देने की बात कही, जो तिमाही अदा होता। साथ ही डिपॉजिट के 95 फीसदी तक ओवरड्राफ्ट 7.70 फीसदी ब्याज पर देने की पेशकश की। बैंक ने यह भी याद दिलाया कि वह 15 साल से ज्यादा समय से PMC की प्रॉपर्टी टैक्स वसूली संभाल रहा है और उसने और वसूली का काम मांगा।
30 अक्टूबर को आयुक्त ने प्रस्ताव स्थायी समिति को भेजा। उसी दिन समिति ने इसे प्रस्ताव क्रमांक 1451 के तहत सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। यह अर्जेंट आइटम के तौर पर आया था और नियमित एजेंडे में नहीं था। रकम का मकसद हाई कैपेसिटी मास ट्रांजिट रूट (HCMTR) और इनर रिंग रोड के लिए जमीन अधिग्रहण बताया गया है।
आयुक्त के अपने पत्र में लिखा है कि PMC की डिपॉजिट आम तौर पर राष्ट्रीयकृत बैंकों, HDFC बैंक और ICICI बैंक में ही रखी जाती है, जिन्हें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया घरेलू व्यवस्थागत रूप से अहम बैंक मानता है। पत्र में कॉसमॉस को "अपवाद का मामला" कहा गया है और कलेक्टर कार्यालय की एक बैठक का जिक्र है, जिसमें 500 करोड़ रुपये के जमीन भुगतान पर बात हुई थी। पत्र महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम, 1949 की धारा 92 का सहारा लेता है, जिसके तहत फालतू निगम निधि मंजूर सहकारी बैंक में रखी जा सकती है। इसी धारा में लिखा है कि ऐसे बैंक में रकम राज्य सरकार की तय सीमा से ज्यादा नहीं हो सकती।
शिंदे ने कई आपत्तियां उठाईं। उनके मुताबिक कॉसमॉस सहकारी बैंक है और आयुक्त के पत्र में PMC निवेश के लिए गिनाई गई श्रेणियों में नहीं आता। किसी दूसरे बैंक से दर नहीं पूछी गई, जबकि पुणे डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक से संपर्क किया जा सकता था। डिपॉजिट पर PMC को 7.40 फीसदी मिलेगा और ओवरड्राफ्ट पर 7.70 फीसदी देना होगा, यानी फर्क से खर्च बढ़ेगा। उन्होंने पूछा कि जब आयुक्त रकम को "फालतू" कह रहे हैं तो PMC को लोन की जरूरत क्यों है।
शिंदे ने दूसरे रास्ते भी गिनाए। PMC ने समान जलापूर्ति योजना के लिए म्युनिसिपल बॉन्ड से 200 करोड़ रुपये जुटाए और JICA प्रोजेक्ट के लिए केंद्र से करीब 800 करोड़ रुपये की मदद पाई। उनके अनुसार बॉन्ड पर निगम पहले ही सालाना करीब 57 करोड़ रुपये ब्याज भर रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या PMC की साख कमजोर हो गई है, क्योंकि बैंक ने कर्ज देने से पहले डिपॉजिट मांगी। उनका कहना है कि इतना सार्वजनिक पैसा रखने से पहले बैंक की माली हालत, क्रेडिट रेटिंग और जोखिम की जांच होनी चाहिए थी।
शिंदे ने यह भी इशारा किया कि बैंक का चुनाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या किसी और राजनीतिक या निजी हित के दबाव में हुआ हो सकता है। उन्होंने रुपी बैंक और जनता बैंक की मुश्किलों का हवाला दिया। इसके लिए उन्होंने कोई सबूत नहीं दिया और संघ की ओर से जवाब नहीं आया है।
दूसरी चिट्ठी में शिंदे ने मौजूदा सफाई ठेकों को दो साल बढ़ाने के स्थायी समिति के फैसले पर ऐतराज किया, जिस पर करीब 100 करोड़ रुपये लगेंगे। उनका आरोप है कि शुरुआती काम बिना सही टेंडर के दिया गया और प्रशासन ने नई बोली बुलाने के बजाय विस्तार चुना। उन्होंने यह भी कहा कि ठेकेदार अपने कर्मचारियों की हाजिरी खुद दर्ज कर रहे हैं और PMC अधिकारियों की निगरानी काफी नहीं है। उनके मुताबिक नए टेंडर से दूसरी एजेंसियां भी बोली लगा सकेंगी और दरें कम आ सकती हैं।
शिंदे ने जांच, विस्तार रद्द करने और नया टेंडर निकालने की मांग की। उनका कहना है कि शहर के हित के खिलाफ जाने वाले स्थायी समिति के किसी भी फैसले को रोकने का अधिकार आयुक्त के पास है।
कॉसमॉस बैंक खुद को दूसरा सबसे बड़ा टियर IV अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक बताता है। उसके सात राज्यों में 195 शाखाएं हैं और मार्च 2026 तक उसका कारोबार 44,000 करोड़ रुपये का है। बैंक के मुताबिक उसने 19 कमजोर सहकारी बैंकों को अपने में मिलाया है।
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