फ्लैट नहीं दिया तो पुणे के नंदगुडे पाटिल डेवलपर्स को 32.87 लाख 15% ब्याज के साथ लौटाने का आदेश
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महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने सुलोचना सिटी के फ्लैट खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाया।
पुणे: महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसले में कहा है कि कोई बिल्डर खरीदार से मोटी रकम ले ले, सालों तक काम अधूरा छोड़ दे और फिर उन अड़चनों का हवाला देकर पल्ला झाड़ ले, जो एग्रीमेंट के वक्त पहले से मालूम थीं, तो यह नहीं चलेगा। आयोग ने नंदगुडे पाटिल डेवलपर्स प्रा. लि. और उसके डायरेक्टर विलास एकनाथ नंदगुडे को आदेश दिया है कि वे पिंपले निलख में फ्लैट सौंपें या 32.87 लाख रुपये 15% सालाना ब्याज के साथ लौटाएं।
आयोग ने मानसिक पीड़ा और परेशानी के लिए 2 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 50,000 रुपये भी देने को कहा है।
यह शिकायत गौतम सुरेश परांजपे ने 2014 में सुलोचना सिटी फेज-I को लेकर दर्ज की थी। सुनवाई कार्यवाहक अध्यक्ष मुकेश वी. शर्मा और सदस्य पूनम वी. महर्षि ने की।
परांजपे ने 16 जून 2011 को रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के तहत फ्लैट D-502 की बुकिंग 41.24 लाख रुपये में की थी। उन्होंने 32.87 लाख रुपये चुकाए। इसमें LIC हाउसिंग फाइनेंस से लिया लोन और उनके पिता के प्रॉविडेंट फंड की बचत से दिए गए 9.5 लाख रुपये भी शामिल हैं।
कीमत का करीब 80% चुका देने के बावजूद, उनका आरोप है कि निर्माण अधूरा रहा। इस बीच वे 26,162 रुपये की मासिक EMI भरते रहे और किराये के मकान में रहते रहे।
डेवलपर का कहना था कि 25 अक्टूबर 2010 की सरकारी अधिसूचना के तहत मुला नदी के पास लगी फ्लड-लाइन की पाबंदियों से काम रुक गया। उसने यह भी कहा कि दूसरे खरीदारों ने पैसे रोक रखे थे।
लेकिन आयोग ने पाया कि डेवलपर ने अधिसूचना पेश करने का वादा करने के बाद भी उसे कभी पेश नहीं किया। इससे भी बड़ी बात यह कि जिन पाबंदियों और मंजूरी से जुड़ी दिक्कतों का हवाला दिया गया, वे जून 2011 के एग्रीमेंट से पहले की थीं।
आयोग ने टिप्पणी की, "जो बिल्डर किसी मुश्किल की पूरी जानकारी के साथ करार करता है, वह बाद में उसी मुश्किल को अपने काबू से बाहर की अनदेखी घटना नहीं कह सकता।"
आयोग के मुताबिक पजेशन की तारीख न लिखना महाराष्ट्र ओनरशिप ऑफ फ्लैट्स एक्ट का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के फॉर्च्यून इन्फ्रास्ट्रक्चर फैसले का सहारा लेते हुए आयोग ने एग्रीमेंट रजिस्ट्रेशन से तीन साल यानी 16 जून 2014 तक की अवधि को काम पूरा करने के लिए वाजिब माना।
आयोग ने कहा, "जब एग्रीमेंट में पजेशन की कोई तारीख तय ही न हो, तो खरीदार को हमेशा के लिए इंतजार नहीं कराया जा सकता।"
आयोग ने करार के असंतुलन की भी आलोचना की। देर से भुगतान पर खरीदार पर 18% ब्याज लगता था, जबकि डेवलपर के लिए डिलीवरी की कोई तय समय-सीमा नहीं थी।
बिल्डर की 2.18 लाख रुपये और मांगने की बात सालों की देरी का बहाना नहीं बन सकती, आयोग ने कहा, खासकर तब जब कीमत का लगभग 80% पहले ही चुकाया जा चुका था।
डेवलपर और उसके डायरेक्टर को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार प्रथा के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए आयोग ने आदेश मिलने के दो महीने के भीतर पजेशन देने को कहा है। साथ ही 23 अप्रैल 2014 से डिलीवरी तक 32.87 लाख रुपये पर 9% सालाना ब्याज भी देना होगा।
विकल्प के तौर पर परांजपे चाहें तो हर भुगतान की तारीख से रकम वसूल होने तक 15% सालाना ब्याज के साथ 32.87 लाख रुपये की वापसी ले सकते हैं।
आयोग ने मुआवजे और खर्च के तौर पर कुल 2.5 लाख रुपये दिए, लेकिन दोहरा मुआवजा न हो, इसलिए किराये की अलग मांग खारिज कर दी। बार-बार कोशिश के बावजूद बिल्डर की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
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