कोथरूड की रेश्मा पठान ने श्मशान की शांति में पढ़कर पाई माइक्रोबायोलॉजी की डिग्री
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पुणे नगर निगम में ठेके पर सफाई कर्मचारी रहीं 25 साल की रेश्मा जहांगीर पठान ने माइक्रोबायोलॉजी की डिग्री ली और अब सार्वजनिक स्वास्थ्य की पढ़ाई कर रही हैं।
हालात कितने भी मुश्किल हों, जिद और मेहनत से कामयाबी मिल सकती है, यह पुणे की 25 साल की रेश्मा जहांगीर पठान ने कर दिखाया है। पुणे महानगरपालिका में ठेके पर सफाई कामगार के तौर पर काम करते हुए उन्होंने माइक्रोबायोलॉजी (सूक्ष्मजीवशास्त्र) की डिग्री हासिल की। बस्ती के शोर में पढ़ाई नहीं हो पाती थी, इसलिए वे श्मशान की शांति में बैठकर पढ़ती थीं।
रेश्मा कोथरूड की साईनाथ बस्ती में रहती हैं। उनके पिता रिक्शा चलाते हैं और घर की आर्थिक हालत कमजोर है। ऐसे में प्राइवेट क्लास लगाना या पढ़ने के लिए अलग जगह लेना उनके बस की बात नहीं थी। बस्ती में हर वक्त होने वाले शोर का असर पढ़ाई पर पड़ रहा था।
तब रेश्मा ने घर के पास की श्मशान भूमि की शांति का सहारा लिया। ज्यादातर लोगों के लिए श्मशान मौत से जुड़ी जगह होती है, लेकिन रेश्मा की पढ़ाई के सफर में यही जगह अहम साबित हुई। वहां चुपचाप बैठकर वे पूरे ध्यान से पढ़ पाईं। हालात के आगे हार माने बिना उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और माइक्रोबायोलॉजी की डिग्री का अपना लक्ष्य पूरा किया। उनके सफर से यही संदेश मिलता है कि पढ़ने की जिद हो तो मुश्किल हालात में भी रास्ता निकल आता है।
रेश्मा पिछले 6 साल से पुणे महानगरपालिका के झाड़ू विभाग में ठेके पर सफाई कामगार थीं। वे जयभवानी नगर के स्वामी समर्थ कोठी में रात की शिफ्ट में ड्यूटी करती थीं। दिन में कॉलेज जाना और रात में काम करना, यही उनकी रोज की दिनचर्या थी। घरवालों का हाथ बंटाते हुए अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्होंने बहुत भागदौड़ की।
रेश्मा ने बताया कि करीब 3 महीने पहले उन्हें काम से हटा दिया गया। उनके मुताबिक वजह यह बताई गई कि महिलाओं को रात में काम नहीं दिया जा सकता। ऊपर से उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में नियमित हाजिर रहना जरूरी था, इसलिए नौकरी और पढ़ाई का तालमेल बिठाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था। इस हाल में उन्होंने पढ़ाई को पहले रखा।
डिग्री मिलने के बाद रेश्मा ने अब सार्वजनिक स्वास्थ्य (पब्लिक हेल्थ) विषय में आगे की पढ़ाई शुरू की है। वे सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में पढ़ रही हैं। आगे चलकर वे समाज के वंचित, जरूरतमंद और अनदेखे तबकों की सेहत के लिए काम करना चाहती हैं।
झोपड़पट्टी की सफाई, पानी की सप्लाई और सेहत से जुड़ी दिक्कतें उन्होंने करीब से देखी और झेली हैं। इसीलिए वे इन सवालों पर सिर्फ किताबी जानकारी से नहीं, बल्कि अपने असली तजुर्बे के सहारे काम करना चाहती हैं।
रेश्मा की राय में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बीमारी से बचाव के उपायों की बड़ी अहमियत है। बीमारी होने के बाद इलाज करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि बीमारी हो ही नहीं। इसी दिशा में काम करके वे समाज के लिए कुछ करना चाहती हैं।
पैसों की तंगी, पढ़ने के लिए जगह की कमी और नौकरी की जिम्मेदारी, इन सब रुकावटों को पार करके रेश्मा ने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की। अब वे उच्च शिक्षा के जरिए अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में हैं। उनका सफर सिर्फ पढ़ाई में कामयाबी की कहानी नहीं है, बल्कि मुश्किल हालात में भी सपनों के पीछे लगे नौजवानों के लिए एक मिसाल है।
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