पुणे यूनिवर्सिटी में VC और रजिस्ट्रार की गाड़ी रुकी, 15-20 छात्रों पर केस, जाति के आरोप पर बहस
चतुशृंगी पुलिस ने सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी के छात्रों और कार्यकर्ताओं पर मामला दर्ज किया है। कुछ छात्र आरोप नकार रहे हैं और जाति के आधार पर निशाना बनाने की बात कह रहे हैं।
पुणे की सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी (SPPU) में वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार की गाड़ी रोकने के मामले में पुलिस ने केस दर्ज किया है। चतुःश्रृंगी पुलिस स्टेशन में 15 से 20 छात्रों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR हुई है। मामला बुधवार, 4 नवंबर की शाम का है। वाइस चांसलर डॉ. सुरेश गोसावी और रजिस्ट्रार प्रफुल्ल पवार उस वक्त कैंपस में अपनी सरकारी गाड़ी से जा रहे थे।
पुलिस के मुताबिक वाकया करीब 6.15 बजे का है। दोनों अधिकारी अपने-अपने दफ्तर से निकलकर वाइस चांसलर के निवास की ओर जा रहे थे। आरोप है कि तभी मुख्य इमारत के सामने छात्र कार्यकर्ताओं की एक टोली इकट्ठा हो गई। उन्होंने नारे लगाए और गाड़ी के आगे डट गए, जिससे गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई। आखिर में गोसावी और पवार को गाड़ी छोड़नी पड़ी और वे पैदल ही निवास तक पहुंचे।
यह शिकायत यूनिवर्सिटी के सिक्योरिटी विभाग में काम करने वाले सुपरवाइजर आबा टूबे ने दी है। वे 50 साल के हैं। उनकी शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराएं लगी हैं। ये धाराएं गलत तरीके से रोकने, गैरकानूनी तौर पर भीड़ जमा करने और सरकारी कर्मचारी को उसके ड्यूटी के काम से रोकने से जुड़ी हैं।
शिकायत में पांच छात्र प्रतिनिधियों के नाम हैं: राहुल ससाणे, मयूर जावळे, अभिजीत गोरे, अजय बनसोडे और किरण सैंदाणे। इनके अलावा तीन और लोगों के नाम भी हैं, और 10 से 15 दूसरे कार्यकर्ताओं का जिक्र है। हर किसी की क्या भूमिका थी, यह जांचना अब पुलिस के जिम्मे है।
इस सबकी जड़ यूनिवर्सिटी का एक सर्कुलर है। मैनेजमेंट काउंसिल ने प्रस्ताव पास किया था कि कैंपस में छात्र आंदोलन करें तो सिर्फ यूनिवर्सिटी और छात्रों के अपने मुद्दों पर। वामपंथी, प्रगतिशील और आंबेडकरवादी छात्र संगठनों ने इसे सिरे से नकार दिया। उनका कहना है कि इससे विरोध जताने का उनका हक छिन जाता है। इन संगठनों ने 2 नवंबर को धरना भी दिया था।
तब प्रशासन ने छात्रों से कहा कि मैनेजमेंट काउंसिल की बैठक में इस पर बात होगी और उसके बाद ही कोई फैसला होगा। इसी भरोसे पर संगठनों ने आंदोलन रोक दिया। मगर बुधवार को बैठक हुई और भी सर्कुलर वापस नहीं लिया गया। नाराज छात्र मुख्य इमारत के बाहर धरने पर बैठ गए। जब वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार कैंपस से निकले, तो छात्रों ने उनकी गाड़ी रोक ली।
FIR में नाम आने के बाद कुछ छात्र खुद को बेकसूर बता रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशासन से सवाल पूछने की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। मयूर के मुताबिक जब छात्र मैनेजमेंट काउंसिल के सदस्यों से मिलने गए थे, तब वह भीड़ में शामिल था। लेकिन जब झड़प हुई, तब वह वहां था ही नहीं। उसका कहना है कि प्रशासन पर लगातार सवाल उठाने की वजह से उसका नाम FIR में डाल दिया गया।
राहुल ससाणे ने इससे आगे बढ़कर आरोप लगाया है कि यूनिवर्सिटी अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों को निशाना बना रही है। उनके हिसाब से शिकायत में नामजद पांच लोगों में से चार SC श्रेणी के हैं। उनका दावा है कि यह समूह कई साल से यूनिवर्सिटी के भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के खिलाफ बोलता आया है, और यह केस उसी का जवाब है।
SPPU के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह बात मानने से मना कर दिया कि FIR जाति देखकर हुई है। अधिकारी के मुताबिक शिकायत में उन्हीं छात्रों के नाम आए हैं जो प्रदर्शन में मौजूद थे, और जाति का इसमें कोई लेना-देना नहीं। उनका कहना है कि कौन मौका-ए-वारदात पर था और कौन नहीं, यह देखकर कानून के हिसाब से कार्रवाई करना पुलिस का काम है। अब सबकी नजर पुलिस की जांच पर है।
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