मंगलवार, 3 नवंबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट

दिवाली में सलवार सूट छोड़िए, पारंपरिक बुनाई वाली साड़ियों से पाइए त्योहारी लुक

दिवाली में सलवार सूट छोड़िए, पारंपरिक बुनाई वाली साड़ियों से पाइए त्योहारी लुक तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

त्योहारों में हर बार कढ़ाई वाले सलवार सूट की जगह कांजीवरम, पैठणी, बांधनी, चंदेरी और कोटा डोरिया जैसी साड़ियां आज़माई जा सकती हैं।

त्योहारों के लिए तैयार होने का मतलब हर बार कढ़ाई वाला एक और सलवार सूट उठा लेना नहीं है। साड़ी भी उतनी ही आकर्षक लग सकती है। सही कपड़ा या बुनाई चुनी जाए तो वह परिवार के साथ दोपहर के खाने, पूजा या शाम के जश्न, तीनों में पहनने लायक आरामदेह भी रहती है। बात यह है कि शादी वाली भारी सजावट की साड़ियों से आगे देखा जाए और पारंपरिक कपड़ों के हल्के रूप आज़माए जाएं।

भारी और पारंपरिक लुक चाहिए तो कांजीवरम और पैठणी पर नज़र डाली जा सकती है। कांजीवरम साड़ियां तमिलनाडु के कांचीपुरम इलाके से आती हैं। अपने रेशम, अलग रंग के बॉर्डर और ज़री के काम के लिए ये जानी जाती हैं। समारोहों में पहनी जाने वाली साड़ी के तौर पर इनकी पहचान रही है, इसलिए त्योहार के लिए ये दमदार पसंद हैं। पारंपरिक कांजीवरम अगर ज़्यादा भारी लगे तो छोटे बॉर्डर, कम ज़री के बूटों या हल्के रेशमी बदन वाली सादी डिज़ाइन देखी जा सकती है।

पैठण की मशहूर रेशमी बुनाई पैठणी महाराष्ट्र की अपनी पहचान है और यह खास क्षेत्रीय विकल्प देती है। इसमें मोर, तोते और कमल के बूटे, जो अक्सर पल्लू में बुने जाते हैं, इसे दूर से पहचानने लायक बनाते हैं। दुल्हन वाली भारी पैठणी की जगह सादे बदन और कम सजे पल्लू वाली साड़ी चुनी जा सकती है।

रंग और आराम के लिए बांधनी अच्छा विकल्प है। यह खास तौर पर गुजरात और राजस्थान से जुड़ी टाई-डाई परंपरा है, जिसमें रंगाई से पहले कपड़े के छोटे-छोटे हिस्से बांध दिए जाते हैं और इससे अलग तरह के पैटर्न बनते हैं। दिन के आयोजनों के लिए सूती बांधनी साड़ियां खास तौर पर काम की हैं, जबकि शाम के मौकों पर रेशमी बांधनी चल सकती है। इनके रंग और पैटर्न के कारण भारी सजावट के बिना भी ये अलग दिखती हैं।

आसानी से लपेटी जा सकने वाली साड़ी चाहिए तो चंदेरी, कोटा डोरिया और कॉटन-सिल्क देखिए। मध्य प्रदेश की चंदेरी अपने हल्के, अक्सर थोड़े पारदर्शी कपड़े और नाज़ुक बूटों के लिए जानी जाती है। राजस्थान की कोटा डोरिया की पहचान उसकी बारीक चेक जैसी बुनाई है, जो उसे हवादार और पहनने में आसान बनाती है। जो थोड़ी चमक चाहते हैं लेकिन भारी रेशम का वज़न नहीं, उनके लिए कॉटन-सिल्क एक और विकल्प है।

पुणे में खरीदारी की शुरुआत लक्ष्मी रोड और कुमठेकर रोड से की जा सकती है, जहां पारंपरिक साड़ियों की कई दुकानें एक जगह मिलती हैं। एक ही चक्कर में अलग-अलग इलाकों की बुनाई और त्योहारी स्टाइल की तुलना करने के लिए ये जगहें काम की हैं। हैंडलूम और रेशम का चुना हुआ संग्रह देखना हो तो जेएम रोड भी एक विकल्प है।

खरीदने से पहले दुकानदार से पूछ लें कि साड़ी हाथकरघे की है या पावरलूम की, कपड़े की बनावट देख लें और साड़ी लपेटकर भी देखें। हल्का बॉर्डर, संभालने लायक पल्लू और आरामदेह ब्लाउज़ बड़ा फर्क ला सकते हैं। मकसद एक त्योहारी वर्दी की जगह दूसरी वर्दी पहन लेना नहीं, बल्कि ऐसी साड़ी ढूंढना है जो आपको अपनी लगे।

#पुणे#कल्चर#PT24#Culture#Pune

विज्ञापन

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप 'आप' पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे