पिंपले गौरव में करीब 100 बाल नर्तकों ने पेश किया भरतनाट्यम, 600 से ज़्यादा दर्शक जुटे
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महा नाट्यालय के "नाट्य वैभवम" में छह से 16 साल के बच्चों ने भरतनाट्यम पेश किया, लाइव कर्नाटक संगीत की संगत रही।
पुणे, 28 अक्टूबर 2006: पिंपले गौरव के नटसम्राट निलू फुले नाट्यगृह में रविवार को करीब 100 बाल नर्तकों ने मंच संभाला। मौका था "नाट्य वैभवम" का, जो भरतनाट्यम की प्रस्तुति थी और जिसे महा नाट्यालय ने आयोजित किया था। कार्यक्रम में 600 से ज़्यादा लोग पहुंचे।
सुंदर मुद्राएं, पेचीदा पदचालन और कर्नाटक संगीत की लय, तीनों एक साथ मंच पर दिखे। कार्यक्रम में युवा कलाकारों की मेहनत और भारत की शास्त्रीय नृत्य परंपरा की कशिश का जश्न मनाया गया।
नर्तकों में ज़्यादातर बच्चे छह से 16 साल की उम्र के थे। उन्होंने अलग-अलग पड़ाव की प्रस्तुतियां दीं। शुरुआती बच्चों की सादगी और मासूमियत थी, तो आगे बढ़ चुके विद्यार्थियों में सटीकता और भावों की गहराई दिखी। शाम से अंदाज़ा मिला कि भरतनाट्यम में कितना अनुशासन, सब्र और कलात्मक विकास लगता है।
महा नाट्यालय की संस्थापक डॉ. महालक्ष्मी कृष्णमूर्ति गुरु श्रीमती मैथिली राघवन की शिष्या हैं। उनके लिए यह प्रस्तुति अपने विद्यार्थियों की सीख और मंच पर बढ़ते आत्मविश्वास को एक साथ सामने लाने का मौका थी।
पुणेकर न्यूज़ से बात करते हुए डॉ. कृष्णमूर्ति ने कहा कि कार्यक्रम उन विद्यार्थियों की कोशिशों को दिखाता है जो अलग-अलग स्तर पर यह कला सीख रहे हैं। प्रस्तुतियों से दिखा कि लगातार अभ्यास से बच्चे बुनियादी मुद्राओं से आगे बढ़कर तालमेल, लय की समझ और भाव प्रदर्शन तक पहुंचते हैं।
शुरुआती विद्यार्थियों ने सरल और मधुर प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। अनुभवी नर्तकों ने पेचीदा पदचालन, सधी हुई नृत्य रचना और अभिनय दिखाया। अभिनय यानी चेहरे के भावों, हाथ की मुद्राओं और शरीर की गतियों से भाव और अर्थ बताने की कला।
दोनों समूहों के फ़र्क से शास्त्रीय नृत्य की पढ़ाई की एक अहम बात सामने आई: कलात्मक विकास धीरे-धीरे होता है और नियमित अभ्यास, बारीकियों पर ध्यान और लय व भाव की समझ पर टिका होता है।
युवा कलाकारों को बड़े दर्शक वर्ग के सामने अपनी सीख आज़माने का मौका मिला। प्रस्तुतियों के साथ तालियां गूंजती रहीं और कार्यक्रम आगे बढ़ने के साथ सराहना भी बढ़ती गई। बच्चों और किशोरों की भागीदारी से यह भी दिखा कि नृत्य संस्थाएं नई पीढ़ी को शास्त्रीय कलाओं से जोड़ने और मंच पर आत्मविश्वास बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं।
"नाट्य वैभवम" का अहम हिस्सा लाइव कर्नाटक संगीत था, जिसने प्रस्तुतियों को लयबद्ध सटीकता और संगीत की गहराई दी। संगत करने वाले कलाकारों में गायक श्री रोहन पिल्लई, वायलिन पर श्री विजय बालाजी और मृदंगम पर श्री पंचम उपाध्ये शामिल थे। डॉ. कृष्णमूर्ति ने नट्टुवनार की भूमिका निभाई और उन लय-तत्वों का तालमेल संभाला जो नर्तकों की गतियों को दिशा देते हैं।
गायक, वायलिन वादक, मृदंगम वादक और नर्तकों के आपसी तालमेल से संगीत और गति एक-दूसरे के पूरक बने। लाइव संगत ने भरतनाट्यम और कर्नाटक संगीत के गहरे रिश्ते को भी उजागर किया, जिसमें लय पदचालन की बुनियाद है और संगीत की व्याख्या नर्तकों के भावों को आकार देती है। संगीत के भक्तिमय रंग ने माहौल को और गाढ़ा किया और दर्शक शाम भर बंधे रहे।
भरतनाट्यम सिर्फ़ मुद्राओं का क्रम सीखना नहीं है। इसमें शारीरिक अनुशासन, लय की सटीकता, संगीत की समझ और प्रस्तुति के ज़रिए भाव और कहानियां पहुंचाने की क्षमता, सब शामिल है। छोटे विद्यार्थियों को ये सब साधने में वक्त लगता है। "नाट्य वैभवम" जैसी प्रस्तुतियां उन्हें अपनी प्रगति दिखाने और दर्शकों के सामने सहज होने का मौका देती हैं।
महा नाट्यालय की संस्थापक के तौर पर डॉ. कृष्णमूर्ति विद्यार्थियों को इस शास्त्रीय नृत्य में आगे बढ़ा रही हैं। इसमें वे अपनी गुरु श्रीमती मैथिली राघवन से मिली तालीम और परंपरा का सहारा लेती हैं।
करीब 100 विद्यार्थियों की भागीदारी से अलग-अलग अनुभव वाले सीखने वाले एक मंच पर आए, जिन्हें भरतनाट्यम में दिलचस्पी ने जोड़ा। शाम का समापन 600 से ज़्यादा दर्शकों की गूंजती तालियों के साथ हुआ। युवा नर्तकों के लिए यह उनकी तैयारी और मेहनत की पहचान का पल था, और गुरु के लिए अपने विद्यार्थियों को प्रस्तुति के ज़रिए अपनी सीख साझा करते देखने का मौका।
इस तरह "नाट्य वैभवम" के ज़रिए महा नाट्यालय ने संगीत, गति और परंपरा को एक साथ पिरोती शाम पेश की, जिसमें पुणे में भरतनाट्यम के उत्सव के केंद्र में युवा नर्तक रहे।
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