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वॉयेजर 1 18 नवंबर को पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन की दूरी पर पहुंचेगा

वॉयेजर 1 18 नवंबर को पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन की दूरी पर पहुंचेगा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
PT24 टीम

नासा का 5 सितंबर 1977 को छोड़ा गया यान अब इतना दूर है कि पृथ्वी से भेजे संदेश को वहां पहुंचने में 24 घंटे लगेंगे।

नासा का वॉयेजर 1 यान अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नया पड़ाव छूने जा रहा है। 5 सितंबर 1977 को छोड़ा गया यह यान 18 नवंबर को पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन (One Light-Day) की दूरी पर पहुंच जाएगा। इंसान की बनाई कोई भी चीज आज तक ब्रह्मांड में इतनी गहराई तक नहीं गई है।

यह एक प्रकाश-दिन आखिर है क्या? प्रकाश एक सेकंड में करीब 3 लाख किलोमीटर का सफर तय करता है। इसी रफ्तार से पूरे 24 घंटे में रोशनी जितनी दूरी नापती है, उसे एक प्रकाश-दिन कहते हैं। यह दूरी लगभग 16.09 अब्ज मील, यानी 25.89 अब्ज किलोमीटर बैठती है। वॉयेजर 1 इस वक्त 38,000 मील प्रति घंटे (61,155 किलोमीटर) की रफ्तार से सौरमंडल के बाहर बढ़ रहा है।

इस दूरी पर पहुंचने के बाद पृथ्वी और यान के बीच बातचीत का हिसाब बदल जाएगा। कैलिफोर्निया की नासा जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी (JPL) के इंजीनियर जो भी रेडियो संदेश यान को भेजेंगे, उसे वॉयेजर 1 तक पहुंचने में 24 घंटे लगेंगे। यान का जवाब वापस पृथ्वी तक आने में 24 घंटे और लगेंगे। यानी एक संदेश के आने-जाने का पूरा चक्र निपटाने के लिए नासा की टीम को 48 घंटे इंतजार करना पड़ेगा।

पचास साल के इस सफर में कई नाटकीय मौके आए हैं। अभी अक्टूबर में कुछ वक्त के लिए यान का पृथ्वी से संपर्क टूट गया था। 18 और 19 अक्टूबर को नासा ने तय वक्त पर यान से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई रेडियो सिग्नल नहीं मिला। इससे नासा के वैज्ञानिकों की धड़कनें बढ़ गई थीं।

फिर यान की अपनी ऑटोमैटिक सेफ्टी सिस्टम काम में आई। यान के कंप्यूटर को चालू थ्रस्टर्स में किसी संभावित गड़बड़ी का पता चला, तो उसने खुद ही बैकअप थ्रस्टर्स चालू कर दिए और यान को सुरक्षित हालत में ले आया। आखिरकार 20 अक्टूबर को नासा के डीप स्पेस नेटवर्क ने वॉयेजर 1 का सिग्नल दोबारा पकड़ लिया और मिशन पर मंडरा रहा बड़ा खतरा टल गया।

वॉयेजर मिशन के मैनेजर करीम बदरुद्दीन (नासा JPL) ने कहा, "किसी अंतरिक्ष यान को इस तरह खुद से सुरक्षा सिस्टम चालू करते हमने पहली बार देखा है। लेकिन हम मिशन के ऐसे दौर में हैं जहां हमें किसी भी अनहोनी के लिए तैयार रहना होगा। वॉयेजर 1 से फिर संपर्क हो जाने से हमें बड़ी राहत मिली है।"

वॉयेजर 1 असल में वॉयेजर 2 के बाद छोड़ा गया था। मगर तेज रास्ते (Fast Trajectory) की वजह से उसने 15 दिसंबर 1977 को ही अपने जुड़वां यान को पीछे छोड़ दिया और एस्टेरॉयड बेल्ट पार कर ली। इस मिशन का शुरुआती मकसद सिर्फ गुरु और शनि ग्रह की पड़ताल करना था।

गुरु के पास यान ने एक बेहद पतला छल्ला खोजा और गुरु के दो नए चांद, थेबे (Thebe) और मेटिस (Metis), ढूंढे। शनि के पास से गुजरते हुए उसने जी-रिंग (G-ring) नाम का नया छल्ला खोजा और शनि के 5 नए चांद दर्ज किए। 12 अगस्त 2012 को वॉयेजर 1 ने हेलिओपॉज (Heliopause) पार किया, जो हमारे सौरमंडल की सरहद है। सूरज से निकलने वाले कणों और चुंबकीय क्षेत्र का असर जहां खत्म होता है, उस इंटरस्टेलर स्पेस में दाखिल होने वाली यह इंसानी इतिहास की पहली चीज बनी।

पृथ्वी से अरबों किलोमीटर दूर सूरज की रोशनी बहुत कमजोर होती है, इसलिए वॉयेजर 1 को सौर ऊर्जा से चलाना मुमकिन नहीं था। नासा ने उसमें रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) लगाए हैं। ये जनरेटर प्लूटोनियम-238 (Plutonium-238) नाम के रेडियोधर्मी पदार्थ के प्राकृतिक क्षय से बनी गर्मी को बिजली में बदलते हैं।

एक प्रकाश-दिन की दूरी पार करने से यान के कामकाज या उसके आसपास के माहौल में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फिर भी यह इस बात का सुनहरा सबूत है कि इंसानी हुनर और तकनीक ने ब्रह्मांड के अथाह फैलाव में कितनी दूर छलांग लगाई है। पचास साल बाद भी यह यान महज 22 वॉट के रेडियो सिग्नल से पृथ्वी से बात कर रहा है।

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