वर्धा के सामाजिक वनीकरण विभाग में RTI की जानकारी देर से, अपील आदेश पर भी सवाल
वर्धा के सामाजिक वनीकरण विभाग से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी तय समय में नहीं मिली, तो आवेदक को प्रथम अपील करनी पड़ी।
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वर्धा के सामाजिक वनीकरण विभाग से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी तय समय में नहीं मिली। इस वजह से आवेदक को प्रथम अपील दाखिल करनी पड़ी। अब इस पूरे मामले से सूचना का अधिकार कानून के असरदार अमल पर सवाल खड़े हो गए हैं।
आवेदक ने 1 सितंबर 2026 को विभाग की जन सूचना अधिकारी प्रीती पुसनाके के पास अर्जी दी थी। इसमें 1 अप्रैल 2024 से 1 सितंबर 2026 तक के अलग-अलग सरकारी कामकाज की जानकारी मांगी गई थी। आवेदक ने छह मुद्दों पर जानकारी और प्रमाणित कागजात की प्रतियां मांगी थीं।
पहला मुद्दा वर्धा जिले में सामाजिक वनीकरण विभाग के सभी वृत्तों की सूची और उनके रिकॉर्ड की फोटोकॉपी का था। दूसरा, हर पौधे पर हुए खर्च का ब्योरा और उससे जुड़े बिल, वाउचर और खर्च के दूसरे कागजात की प्रमाणित प्रतियां। तीसरा, पौधों की बिक्री, बंटवारे और वितरण की एंट्रियां और लाभार्थियों की सूची।
चौथे मुद्दे में इस दौरान विभाग को मिले फंड का ब्योरा, फंड का इस्तेमाल और खर्च से जुड़े कागजात की प्रमाणित प्रतियां मांगी गईं। पांचवां, मजदूरों के कामों की सूची, मंजूर रकम और असल में हुए खर्च का ब्योरा। छठा, टेंडर, कोटेशन, वर्क ऑर्डर, करारनामे, काम पूरा होने के प्रमाणपत्र और उपलब्ध हों तो वैधता प्रमाणपत्रों की प्रमाणित प्रतियां।
तय मुद्दत में जानकारी नहीं मिली, तो आवेदक ने 5 अक्टूबर 2026 को प्रथम अपील अधिकारी और सहायक वनरक्षक अंकिता नरेश तेलंग के पास अपील दाखिल की। इस अपील पर 13 अक्टूबर 2026 को दोपहर 3 बजे सुनवाई हुई।
सुनवाई में आवेदक ने लिखित बयान देकर बताया कि उन्हें अब तक जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि धारा 6(3) के तहत अर्जी किसी दूसरे विभाग को भेजी गई हो, तो सिर्फ इस वजह से आवेदक का जानकारी पाने का हक खत्म नहीं होता।
आवेदक ने धारा 7(6) का भी हवाला दिया। इसके मुताबिक धारा 7(1) में बताई गई मुद्दत का पालन न हुआ हो, तो जानकारी मुफ्त देनी होती है। यह बात भी उन्होंने सुनवाई में लिखित रूप में रखी।
आवेदक का कहना है कि प्रथम अपील अधिकारी ने लिखित आदेश दिया कि आवेदक जरूरी रकम भरकर जानकारी ले ले। आदेश में यह साफ नहीं लिखा कि जानकारी कितने दिनों में दी जाएगी। इस बात पर आवेदक ने नाराजगी जताई है।
मांग की जा रही है कि मुफ्त जानकारी का प्रावधान लागू होता है या नहीं, यह संबंधित रिकॉर्ड और समय-सीमा के आधार पर देखा जाए। अर्जी भेजे जाने, फीस की मांग और जानकारी देने की मुद्दत पर भी साफ स्थिति होनी चाहिए।
सरकारी विभागों में पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक फंड के इस्तेमाल की जानकारी नागरिकों को मिलना लोकतंत्र का अहम हिस्सा है। पौधारोपण, पौधों के वितरण, फंड के इस्तेमाल और मजदूरों के कामों के रिकॉर्ड जवाबदेही के लिहाज से जरूरी हैं। जानकारी के लिए बार-बार अर्जी, अपील और सुनवाई के चक्कर काटने पड़ें, तो आम नागरिकों का वक्त और पैसा जाता है।
मांग है कि संबंधित जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपील अधिकारी के कामकाज की वरिष्ठ स्तर पर जांच हो। जानकारी देने में हुई देरी, फीस की मांग, धारा 7(6) लागू होने पर विचार और आदेश में समय-सीमा न होने की कानून के मुताबिक पड़ताल की जाए। आवेदक को मांगी गई जानकारी नियम से दी जाए, और कानून का उल्लंघन साबित हो तो सक्षम प्राधिकारी नियम के मुताबिक कार्रवाई करें।
यह मांग सूचना का अधिकार कार्यकर्ता आशिष सोनटक्के ने की है। वे भीम आर्मी संविधान रक्षक दल, वर्धा के जिलाध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में जानकारी नागरिकों का हक है और पारदर्शी प्रशासन सरकार की जिम्मेदारी है।
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