उल्हासनगर: सुप्रीम कोर्ट ने महापौर की याचिका लौटाई, 7 स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति पर रोक बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने उल्हासनगर महापौर और सदन नेता की याचिका खारिज कर मामला बॉम्बे हाईकोर्ट को लौटाया और चार हफ्ते में निपटारे को कहा।
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उल्हासनगर नगर निगम में स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति को लेकर भाजपा और एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना के बीच चल रही सियासी और कानूनी लड़ाई में नया मोड़ आ गया है। महापौर अश्विनी निकम और सदन नेता अरुण आशान ने बॉम्बे हाईकोर्ट के स्थगन आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने ये याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं से कहा गया है कि वे फिर से हाईकोर्ट में अपनी बात रखें। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट इस मामले का निपटारा चार हफ्तों में करे। इसलिए सात स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति का सवाल अभी अटका हुआ है।
मामला यह है कि स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति के लिए 1 अक्टूबर को विशेष महासभा बुलाई गई थी। नगर निगम में पार्टियों की संख्या के हिसाब से भाजपा ने चार सीटों पर और शिवसेना की अगुवाई वाली उल्हासनगर शहर विकास आघाड़ी ने तीन सीटों पर दावा किया था।
लेकिन महापौर अश्विनी निकम ने शिवसेना की अगुवाई वाले गठबंधन के पांच और भाजपा के दो, यानी कुल सात सदस्यों के नाम की सिफारिश की। नगर निगम आयुक्त ने भाजपा के चार नाम सुझाए थे, मगर उनमें से सिर्फ दो नाम लिए गए। इसी बात पर भाजपा ने फैसले का विरोध किया।
महापौर के फैसले के खिलाफ भाजपा के जिलाध्यक्ष राजेश वधारिया और प्रदीप रामचंदानी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में कहा गया कि आयुक्त के सुझाए नामों में महापौर ने बदलाव किया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सात स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति की अधिसूचना जारी करने की आगे की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाया कि क्या महापौर को आयुक्त के सुझाए नाम ठुकराने का अधिकार है।
हाईकोर्ट की रोक के बाद महापौर निकम और सदन नेता आशान ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की। उनकी मांग थी कि हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर नियुक्तियों का रास्ता खोला जाए। सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से मना कर दिया और उन्हें हाईकोर्ट जाने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महापौर की सिफारिश किए गए सात स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति पर अनिश्चितता बनी हुई है। इन नियुक्तियों का भविष्य अब हाईकोर्ट के अगले फैसले पर टिका है। भाजपा के चार में से दो उम्मीदवारों के नाम छूटने से शुरू हुआ विवाद अब दोनों पार्टियों की सियासी तकरार का बड़ा मुद्दा बन गया है।
राज्य की सत्ता में भाजपा और शिवसेना सहयोगी दल हैं, फिर भी उल्हासनगर नगर निगम में स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति पर दोनों के बीच मतभेद खड़े हो गए हैं। सात सीटों के बंटवारे से शुरू हुआ यह झगड़ा अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति से नगर निगम में पार्टियों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ता है, इसलिए इस मामले का सियासी महत्व बढ़ गया है। स्थानीय राजनीतिक हलकों की नजर इस पर है कि दोनों पार्टियां आगे क्या रुख अपनाती हैं।
अब इस मामले की अगली सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट में होगी। उम्मीद है कि वहां इन सवालों पर फैसला होगा कि आयुक्त की सिफारिश के नाम बदलने का महापौर का फैसला नियम के मुताबिक था या नहीं, और सात स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति की प्रक्रिया कानूनी थी या नहीं। अगले चार हफ्ते इस मामले के लिए अहम रहेंगे।