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15:12 IST

तमिल कवि और चिंतक संत तिरुवल्लुवर कौन थे, क्या है उनके तिरुकुरल का महत्व

तमिल संत परंपरा के कवि, तत्त्वज्ञ और समाजचिंतक संत तिरुवल्लुवर और उनके ग्रंथ तिरुकुरल का परिचय।

तमिल कवि और चिंतक संत तिरुवल्लुवर कौन थे, क्या है उनके तिरुकुरल का महत्व तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

भारतीय संत परंपरा किसी एक प्रदेश या एक भाषा तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में जन्मे संतों ने अपने विचारों से इंसानियत को नीति, सदाचार, कर्तव्य और प्रेम की राह दिखाई। दक्षिण भारत की तमिल संत परंपरा में ऐसा ही एक अमर नाम है संत तिरुवल्लुवर। वे कवि, तत्त्वज्ञ और समाजचिंतक थे और उनकी कलम से निकले विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक माने जाते हैं।

उनके महान ग्रंथ तिरुकुरल ने तमिल साहित्य को समृद्ध तो किया ही, इंसानी जिंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर ऐसा चिंतन भी रखा जो हर दौर में काम आता है।

तिरुवल्लुवर की जिंदगी के बारे में ऐतिहासिक जानकारी सीमित है और उनके जन्मकाल को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। आम तौर पर उन्हें प्राचीन तमिल साहित्य की परंपरा और संगम काल से जोड़ा जाता है। परंपरा के मुताबिक उनका जन्मस्थान मैलापुर, चेन्नई बताया जाता है। तमिलनाडु सरकार की परंपरा के अनुसार उनका जन्म ईसा पूर्व 31 में हुआ माना जाता है, लेकिन उनके कालखंड को लेकर अलग-अलग अध्येताओं की अलग-अलग राय है।

परंपरा यह भी कहती है कि तिरुवल्लुवर सादा जीवन जीने वाले बुनकर थे। माना जाता है कि उनकी पत्नी का नाम वासुकी था। उनकी जिंदगी की सादगी और उनके विचारों की ऊंचाई के बीच का फर्क खास तौर पर ध्यान खींचता है। रोजमर्रा के अनुभवों से ही उन्होंने इंसानी जिंदगी का बुनियादी तत्त्वज्ञान सामने रखा।

तिरुवल्लुवर का सबसे बड़ा योगदान तिरुकुरल ग्रंथ है। तमिल भाषा के इस ग्रंथ को दुनिया भर में अहम नीति तत्त्वज्ञान माना जाता है। बहुत छोटी द्विपदियों के जरिए उन्होंने जीवन के कई सवालों पर अपनी बात रखी।

तिरुकुरल के तीन प्रमुख विभाग हैं। अरम में सदाचार, नीति और नैतिक जीवन है। पोरुल में समाज, शासन, अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक जीवन है। इनबम में प्रेम और इंसानी भावनाएं हैं।

इन तीन विभागों में व्यक्ति का निजी जीवन, सामाजिक जिम्मेदारी, राजा का कर्तव्य, प्रशासन, दोस्ती, परिवार, शिक्षा, संयम, ईमानदारी और प्रेम जैसे अनगिनत विषयों पर विचार किया गया है। बेहद सरल शब्दों में रखे गए ये विचार किसी एक दौर तक बंधे नहीं रहते, इसीलिए तिरुकुरल को सार्वकालिक स्वरूप मिला है।

तिरुवल्लुवर के विचारों के केंद्र में नीति और सदाचार हैं। उनकी रचनाओं से संदेश मिलता है कि आदमी की बड़ाई उसकी दौलत या सामाजिक हैसियत में नहीं, बल्कि उसके आचरण में है। ज्ञान पाना जितना जरूरी है, उसे सही आचरण में उतारना भी उतना ही जरूरी है। सत्य, संयम, दया, कृतज्ञता, नम्रता, परिश्रम और न्याय जैसे मूल्यों को उन्होंने खास जगह दी। उनके तत्त्वज्ञान से यह विचार साफ झलकता है कि व्यक्ति का चरित्र बनता है तो समाज का चरित्र भी बनता है।

तिरुकुरल का एक अहम पक्ष राजकाज पर उसका चिंतन है। योग्य राजा या शासक में कौन से गुण होने चाहिए, प्रशासन कैसा हो, न्याय का महत्व क्या है, योग्य सलाहकारों की कितनी जरूरत है और प्रजा के कल्याण को शासन कैसे प्राथमिकता दे, इन सब पर तिरुवल्लुवर ने विचार रखे। उनके लेखन से साफ होता है कि शासन सत्ता भोगने का साधन नहीं, जनकल्याण की जिम्मेदारी है। इसलिए तिरुकुरल सिर्फ नैतिकता का ग्रंथ नहीं रहता, सामाजिक और राजनीतिक विचार का भी अहम दस्तावेज बन जाता है।

तिरुवल्लुवर के विचारों की एक और खासियत उनका व्यापक मानवतावादी नजरिया है। उन्होंने इंसानी जिंदगी के सद्गुणों को अहमियत दी और जन्म, सामाजिक स्थान या बाहरी पहचान से ऊपर आचरण को रखा। इसी वजह से तिरुकुरल समाज के अलग-अलग तबकों में लोकप्रिय हुआ। इसका संदेश किसी एक समूह के लिए नहीं, पूरी मानवजाति के लिए है।

कन्याकुमारी में तिरुवल्लुवर की याद में एक भव्य स्मारक खड़ा है। समुद्र की चट्टान पर बनी उनकी करीब 133 फीट ऊंची मूर्ति को तमिल संस्कृति और तिरुवल्लुवर के विचारों का प्रतीक माना जाता है। मूर्ति की 133 फीट ऊंचाई भी मायने रखती है। तिरुकुरल के 133 अध्यायों के प्रतीक के तौर पर यह ऊंचाई तय की गई है। कन्याकुमारी के समुद्र किनारे विवेकानंद रॉक मेमोरियल के परिसर में खड़ी यह मूर्ति दक्षिण भारत की सांस्कृतिक विरासत का अहम प्रतीक बन गई है।

संत तिरुवल्लुवर का काम सिर्फ एक भाषा के साहित्य का गौरव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की विशाल विचार परंपरा का एक अनमोल अध्याय है। वक्त बदला, समाज बदला, जीवनशैली बदली, लेकिन सत्य, नीति, प्रेम और सदाचार की अहमियत नहीं बदली। यही तिरुवल्लुवर के विचारों का असली अमर संदेश है।

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