सोमप्रभा: कथासरित्सागर की वो यंत्रकला जानने वाली, जिसकी पेटी में थीं चलती-बोलती बाहुलियाँ
कथासरित्सागर में मायासुर की बेटी सोमप्रभा की यांत्रिक बाहुलियों का वर्णन मिलता है, जो फूलों की माला लातीं, पानी देतीं, नाचतीं और बोलती थीं।
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भारत में प्राचीन कला, परंपराओं और बीते ज़माने के अद्भुत ज्ञान का बहुत बड़ा खज़ाना है। इतिहास के साथ-साथ पुरानी दंतकथाएँ भी उतनी ही हैरान करने वाली हैं। ऐसी ही एक प्राचीन कथा सोमप्रभा की है। इस कथा में जादुई चीज़ों, हवा में सफ़र और अपने आप काम करने वाली मशीनों का अनोखा वर्णन मिलता है।
संस्कृत कथासंग्रह 'कथासरित्सागर' में सोमप्रभा का उल्लेख ख़ास तौर पर मिलता है। कथा के मुताबिक वह मशहूर असुर और वास्तुशिल्पकार मायासुर की बेटी थी। मायासुर अपनी अद्भुत इमारतों और मायावी कलाओं के लिए जाना जाता था। हिंदू मान्यता में जादुई त्रिपुरासुर की नगरी भी मायासुर ने ही बनाई थी। कहा जाता है कि उसने लोहे, चांदी और सोने से आसमान में तैरते तीन शहर बनाए थे। मायासुर से सोमप्रभा को कई अनोखी कलाओं और यंत्र बनाने का ज्ञान मिला था।
कथा का सबसे दिलचस्प हिस्सा सोमप्रभा की यंत्रों से भरी पेटी है। वह अपनी सहेली कलिंगसेना से मिलने आई, तो उसने इस पेटी से लकड़ी की बनी कुछ ग़ज़ब की यांत्रिक बाहुलियाँ दिखाईं। कथा के मुताबिक एक बाहुली में खास कल दबाने पर वह हवा में उड़कर जाती और फूलों की माला लेकर लौट आती थी। दूसरी बाहुली पानी लाती थी, जबकि कुछ बाहुलियाँ नाचती और बोलती भी थीं।
आज के दौर में ऐसे वर्णनों की तुलना रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और प्रोग्राम की गई मशीनों के ख़याल से की जा सकती है। हालाँकि कथा में बताई गई मशीनें सचमुच मौजूद थीं, इसका कोई ठोस ऐतिहासिक सबूत नहीं है। लेकिन इससे यह दिखता है कि बेजान चीज़ों से अपने आप काम करवाने का ख़याल प्राचीन कथाकारों को कितना खींचता था। एक कथा के अनुसार मायासुर के पास यंत्रमानवों से बंधी पूरी युद्ध-सेना भी थी।
सोमप्रभा की कथा सिर्फ़ यांत्रिक बाहुलियों तक सीमित नहीं है। उसके किरदार में ज्ञान, हुनर और सूझबूझ को अहमियत दी गई दिखती है। कथा में वह अपनी सहेली को ख़ुश करने के लिए ये अनोखी चीज़ें दिखाती है। इस प्रसंग से यह ख़याल सामने आता है कि मशीनें सिर्फ़ जंग या ताक़त की निशानी नहीं हैं, वे मनोरंजन और रोज़ के कामों में भी काम आ सकती हैं।
आज हम रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता AI और अपने आप चलने वाली मशीनों की बात करते हैं, इसलिए सोमप्रभा की कथा ख़ास दिलचस्प लगती है। पर पौराणिक वर्णन और वैज्ञानिक सबूत के बीच फ़र्क रखना ज़रूरी है। यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि सोमप्रभा आज के मायने में रोबोट बना सकती थी। फिर भी अपने आप हरकत करने वाली, चीज़ें लाने वाली और बात करने वाली मशीनों का ख़याल प्राचीन साहित्य में मिलना कल्पना की दुनिया के लिहाज़ से काफ़ी उल्लेखनीय है।
कथा यह भी बताती है कि इंसान की कल्पना को वक़्त और साधनों की सीमा नहीं होती। सदियों पहले की कहानियों में भी इंसान के काबू में रहकर काम करने वाली अद्भुत मशीनों के सपने सजाए गए थे। इसलिए सोमप्रभा सिर्फ़ एक पौराणिक किरदार नहीं, बल्कि प्राचीन साहित्य में यंत्रकौशल की कल्पना का आकर्षक प्रतीक है।
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