सीबीजी परियोजनाओं के लिए राज्य सरकार ने रखे 500 करोड़ रुपये, कचरे से बनेगा स्वच्छ ईंधन
राज्य सरकार ने 2026-27 में सीबीजी परियोजनाओं के लिए 500 करोड़ रुपये का फंड तय किया है।
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शहरों के कचरे और खेती के अवशेषों से स्वच्छ ईंधन और जैविक खाद बनाने को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने संपीडित जैवगैस (सीबीजी) प्रोजेक्टों के लिए 2026-27 वित्त वर्ष में 500 करोड़ रुपये का फंड तय किया है। नगर विकास विभाग के उपसचिव अनिरुद्ध जेवळीकर ने यह जानकारी दी। उनके मुताबिक हर प्रोजेक्ट को प्रतिदिन प्रतिटन क्षमता के हिसाब से 75 लाख रुपये तक और ज्यादा से ज्यादा 15 करोड़ रुपये तक व्यवहार्यता अंतर निधि मिलेगी।
जेवळीकर ने बताया कि इस नीति से कचरे की आर्थिक कीमत बढ़ेगी, निजी निवेश आएगा और रोजगार बनेगा। उन्होंने यह बात मुंबई के ताज प्रेसिडेंट होटल में हुई राज्यस्तरीय कार्यशाला में रखी। यह कार्यशाला केंद्रीय पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय की तरफ से भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के सहयोग से हुई थी। विषय थे गोबरधन योजना, आदर्श राज्य संपीडित जैविक गैस नीति और सैस्की 2026-27। वहां उन्होंने गोबरधन, आदर्श राज्य सीबीजी नीति और राज्यों के पूंजी निवेश के लिए विशेष सहायता योजना (एसएएससीआई) पर प्रेजेंटेशन दिया।
उन्होंने बताया कि राज्य की 29 महानगरपालिकाओं, 248 नगरपरिषदों और 147 नगरपंचायतों, यानी कुल 424 शहरी स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के इलाके में रोज 24 हजार 859 टन कचरा निकलता है। इसमें 13 हजार 673 टन गीला और 11 हजार 186 टन सूखा कचरा है। इस कचरे के साथ खेती के अवशेष, पशुओं का गोबर, बाजार समितियों का कचरा, चीनी उद्योग के उपोत्पाद और बायोमास से भी सीबीजी बनाई जाएगी।
सीबीजी प्रोजेक्ट की न्यूनतम क्षमता प्रतिदिन 20 टन होगी। ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट सार्वजनिक-निजी भागीदारी या हाइब्रिड एन्युटी मॉडल से खड़े किए जा सकेंगे। छोटे शहरों के लिए समूह आधारित प्रोजेक्टों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। प्रतिदिन प्रतिटन क्षमता पर एक एकड़ के हिसाब से कम से कम एक और ज्यादा से ज्यादा 20 एकड़ जमीन दी जा सकेगी। जमीन का भाड़ा रेडी रेकनर दर का 0.7 प्रतिशत होगा और हर तीन साल में उसमें पांच प्रतिशत बढ़ोतरी होगी। प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद 2.5 प्रतिशत राज्य जीएसटी रिफंड, टिपिंग शुल्क और पानी व बिजली की सुविधा देने का प्रावधान है, यह भी जेवळीकर ने बताया।
कच्चा माल जुटाने के लिए किसान उत्पादक संस्थाओं और महिला स्वयंसहायता समूहों के जरिए बायोमास इकट्ठा किया जाएगा। कृषि उपज बाजार समितियों, गोशालाओं और चीनी कारखानों के साथ लंबी अवधि के सप्लाई करार करके कच्चे माल की उपलब्धता पक्की की जाएगी।
एसएएससीआई योजना के तहत राज्य सीबीजी नीति के तालमेल के लिए 1,300 करोड़, तैयारी सूचकांक के लिए 500 करोड़ और वित्तीय सह-वित्तपोषण के लिए 1,200 करोड़ रुपये का प्रावधान है। महाराष्ट्र 'अ' श्रेणी में आता है। नीति के तालमेल के लिए ज्यादा से ज्यादा 100 करोड़, तैयारी सूचकांक में पहले तीन राज्यों में जगह मिले तो 75 करोड़ और वित्तीय सह-वित्तपोषण के लिए 200 करोड़ रुपये तक की मदद मिल सकती है। यह मदद पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर मिलती है।
नीति को लागू करने के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला जैव-सीबीजी समन्वय समितियां, नगर विकास विभाग की अध्यक्षता में कार्यकारी समिति और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्यस्तरीय संचालन समिति काम करेगी। जमीन का आवंटन, प्रोजेक्ट की मंजूरी, विभागों का तालमेल और प्रगति की समीक्षा यही व्यवस्था करेगी।
एसएएससीआई की पात्रता के लिए एक खिड़की पोर्टल, समय-सीमा में मंजूरी, शिकायत निवारण व्यवस्था और कच्चे माल की योजना जरूरी है। महाराष्ट्र से अपेक्षा है कि वह एक दिसंबर 2026 से पहले एक खिड़की पोर्टल और दो स्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था चालू करे, कच्चा माल इकट्ठा करने वालों का रजिस्ट्रेशन करे और जमीन आवंटन की कार्यवाही शुरू करे। जेवळीकर ने प्रेजेंटेशन में कहा कि इस नीति से कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन, स्वच्छ ईंधन और जैविक खाद का उत्पादन, निजी निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और राज्य की चक्रीय अर्थव्यवस्था और मजबूत होगी।
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