विदर्भ में जनता के पानी में कटौती, उद्योगों को भरपूर सप्लाई पर उठा सवाल
विदर्भ में सूखे जैसे हालात के बीच जनता और किसानों के पानी में कटौती हो रही है, जबकि उद्योगों को पानी देने पर सवाल उठ रहे हैं।
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नागपुर: महाराष्ट्र का विदर्भ इलाका आज देश के औद्योगिक नक्शे पर एक अहम हब बनकर उभरा है। यहाँ रक्षा सामग्री बनाने, ताप विद्युत से बिजली पैदा करने, सीमेंट उत्पादन और स्टील और खनिज संपदा की साफ सफाई जैसी बड़ी परियोजनाएं कई सालों से कामयाबी के साथ चल रही हैं। सरकार और उद्योग जगत की मंशा है कि आगे भी इन्हीं क्षेत्रों की नई परियोजनाएं विदर्भ में लाई जाएं।
इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि विदर्भ में पानी भरपूर है और यहाँ का पर्यावरण संतुलित होने के साथ उद्योग के अनुकूल है। रक्षा, ऊर्जा, सीमेंट और स्टील और खनिज संपदा की साफ सफाई जैसे क्षेत्रों को उत्पादन के लिए बहुत ज्यादा पानी चाहिए। इसी वजह से ऐसे जल-गहन (Water Intensive) उद्योग विदर्भ में लगे हुए हैं और आगे भी यहीं आने की कतार में हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से उलटी है। इन दिनों महाराष्ट्र समेत पूरे देश में सूखे-अकाल जैसे हालात हैं और हर तरफ पानी के लिए हाय-तौबा मची है। जलाशयों का स्तर नीचे चला गया है। सरकार और प्रशासन बार-बार 'पानी बचाओ, पानी की कटौती' की अपील कर रहा है। शहरों में एक दिन छोड़कर पानी सप्लाई किया जा रहा है, जबकि गाँवों में पीने के पानी की किल्लत के साथ खेत-खलिहान भी सूख रहे हैं। इस कटौती का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर दिखने लगा है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरकार रक्षा, ऊर्जा और स्टील और खनिज संपदा की साफ सफाई जैसी पानी पर टिकी परियोजनाओं के लिए भी 'कम पानी उपयोग' की नीति लागू करेगी? क्या उनके पानी में भी कटौती होगी?
अगर सरकार की नीति 'सबके लिए एक नियम' की है, तो जो उद्योग पूरी तरह पानी पर निर्भर हैं, उनका पानी घटने पर उत्पादन पर असर पड़ना तय है। ताप विद्युत संयंत्रों को ठंडा रखने में, सीमेंट प्लांट में और आयुध निर्माणियों में रोज हजारों लीटर पानी लगता है। पानी घटा तो उत्पादन घटेगा और बिजली संकट गहराएगा।
जो सैकड़ों नई परियोजनाएं अभी सिर्फ कागजों पर हैं, जैसे नए डिफेंस कॉरिडोर, सोलर और थर्मल पावर का विस्तार और नए सीमेंट क्लस्टर, वे कागजों तक ही रह जाएंगी। वजह यह कि निवेशक पानी की अनिश्चितता वाले इलाके में पूंजी नहीं लगाएंगे।
अब देखना यह है कि इस मुश्किल हालात में सरकार की नीति और नीयत उसे कहाँ तक पहुंचाती है। क्या वह इस संकट में हिम्मत दिखाकर सबके लिए समान फैसला लेगी और सभी क्षेत्रों में पानी की कटौती का न्यायसंगत फॉर्मूला लागू करेगी?
या फिर वह दोहरी नीति अपनाएगी, जिसमें एक तरफ जनता, किसानों और खेत-खलिहान का पानी काटकर उनसे त्याग करने को कहा जाएगा, और दूसरी तरफ उद्योगों को बिना रुकावट लबालब पानी देकर उत्पादन चालू रखने दिया जाएगा?
विदर्भ के पानी का सच और सरकार की मंशा, दोनों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। क्योंकि पानी से ही तय होगा कि विदर्भ का भविष्य उद्योगों का होगा या खेतों का, या दोनों के बीच संतुलन का।
राजीव रंजन कुशवाहा
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