शुक्राणु ठीक हों फिर भी गर्भधारण में रुकावट, डॉ. येरणे ने गिनाईं पुरुषों की दो दिक्कतें
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पुरुषों की प्रजनन क्षमता परखते वक्त शुक्राणुओं की संख्या और उनकी क्वालिटी अहम मानी जाती है। लेकिन शारीरिक संबंध के दौरान शुक्राणुओं को महिला के प्रजनन मार्ग तक पहुंचाने की क्षमता भी जोड़े के नैचुरल तरीके से गर्भधारण की संभावना पर असर डाल सकती है।
बिर्ला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, नागपुर के फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. प्रमोद येरणे के मुताबिक यौन क्षमता और प्रजनन क्षमता, दोनों प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी हैं, मगर ये अलग-अलग चीजें हैं। किसी पुरुष में शुक्राणु बनना सामान्य हो, फिर भी उसे इरेक्शन हासिल करने में दिक्कत हो सकती है। इसी तरह, जिसे संबंध बनाने में कोई परेशानी नहीं है, उसकी सीमेन एनालिसिस की रिपोर्ट असामान्य आ सकती है। डॉ. येरणे के अनुसार गर्भधारण की कोशिश कर रहे जोड़ों की जांच में यह फर्क समझना बेहद जरूरी है।
इरेक्टाइल डिसफंक्शन का मतलब है, शारीरिक संबंध के लिए काफी इरेक्शन हासिल करने या उसे बनाए रखने में लगातार नाकामी। जब इसकी वजह से संबंध बनाना मुश्किल होता है, तो नैचुरल गर्भधारण की संभावना घट सकती है। वहीं स्खलन से जुड़े विकार अलग-अलग तरह से प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकते हैं।
स्खलन में देरी हो या स्खलन हो ही न, तो वीर्य का योनिमार्ग में पहुंचना रुक सकता है। कुछ पुरुषों में रेट्रोग्रेड इजैक्युलेशन की दिक्कत होती है, जिसमें वीर्य लिंग से बाहर आने के बजाय पीछे मूत्राशय में चला जाता है। नतीजा यह कि शुक्राणु महिला के प्रजनन मार्ग तक नहीं पहुंच पाते और नैचुरल गर्भधारण मुश्किल हो जाता है।
इन दिक्कतों के पीछे कई मेडिकल और मानसिक कारण हो सकते हैं। डायबिटीज, हार्मोन का असंतुलन, नर्वस सिस्टम से जुड़े विकार, खून के बहाव पर असर डालने वाली समस्याएं और कुछ खास दवाइयां सामान्य यौन क्षमता में रुकावट डाल सकती हैं। मिसाल के तौर पर, कंट्रोल में न रहने वाली डायबिटीज से इरेक्शन और स्खलन से जुड़ी नसों और रक्तवाहिनियों को नुकसान पहुंच सकता है। खासकर जब ओव्यूलेशन के हिसाब से संबंध का वक्त तय किया जाता है, तब पैदा होने वाला मानसिक तनाव और परफॉर्मेंस एंग्जायटी यानी प्रदर्शन की चिंता भी इसमें इजाफा कर सकती है। फिर भी लगातार बनी रहने वाली इन दिक्कतों को सिर्फ मानसिक वजह मान लेना ठीक नहीं, क्योंकि इनके पीछे कोई छिपी मेडिकल बीमारी हो सकती है जिस पर ध्यान देना जरूरी हो।
जांच की शुरुआत विस्तार से मेडिकल और यौन हिस्ट्री जानने से होती है, ताकि समझा जा सके कि समस्या किस तरह की है और कितने समय से है। इस मूल्यांकन के आधार पर डॉक्टर शुक्राणुओं की संख्या, उनकी हरकत और आकार जांचने के लिए सीमेन एनालिसिस की सलाह दे सकते हैं। इलाज समस्या की जड़ पर निर्भर करता है। इसमें दवाइयां, जुड़ी बीमारियों पर कंट्रोल या स्खलन के विकारों के खास मेडिकल उपाय शामिल हो सकते हैं।
इन उपायों के बाद भी नैचुरल तरीके से गर्भधारण न हो, तो शुक्राणुओं की क्वालिटी और प्रजनन क्षमता के दूसरे पहलुओं को देखते हुए आईयूआई या आईसीएसआई के साथ आईवीएफ जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) पर विचार किया जा सकता है। चुनिंदा केसों में शुक्राणु हासिल करने के लिए स्पर्म रिट्रीवल की खास प्रक्रियाओं की भी जरूरत पड़ सकती है।
डॉ. येरणे के मुताबिक गर्भधारण की कोशिश के दौरान अगर लगातार इरेक्शन या स्खलन में दिक्कत आ रही हो, तो जोड़ों को जांच में देर किए बिना डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए। यह तय हो जाए कि गड़बड़ी यौन जीवन में है, शुक्राणुओं की क्वालिटी में है या दोनों में, तो सही इलाज चुनने और गर्भधारण की संभावना बढ़ाने में मदद मिल सकती है।