सतारा में गन्ने के दाम पर किसान संगठन सख्त, दिवाली के बाद सड़क पर उतरने की चेतावनी
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स्वाभिमानी किसान संगठन का कहना है कि आंदोलन के बाद 4200 रुपये प्रति टन का दाम तय हुआ था। अब सतारा में संरक्षक मंत्री की बैठक से किसान नाराज हैं और दिवाली के बाद संघर्ष की बात कही गई है।
सतारा जिले में गन्ने के दाम का मामला फिर गरमा गया है। स्वाभिमानी किसान संगठन के जिलाध्यक्ष और सतारा जिला परिषद सदस्य राजू शेलके ने मिल मालिकों और जनप्रतिनिधियों को सीधी चेतावनी दी है कि तय दाम नहीं मिला तो दिवाली के बाद संघर्ष होगा।
संगठन के नेता राजू शेट्टी की अगुवाई में किणी टोल नाके और नागठाणे में किसानों ने आंदोलन किया था। इसे अच्छा समर्थन मिला और पुणे-बेंगलुरु राष्ट्रीय महामार्ग करीब 62 घंटे तक रोका गया। संगठन का दावा है कि इसके बाद 4200 रुपये प्रति टन गन्ना दाम देने पर सकारात्मक सहमति बनी। संगठन के मुताबिक प्रशासन ने भरोसा दिया था कि कोल्हापुर, सांगली और सतारा, तीनों जिलों के किसानों को यही दाम मिलेगा।
अब सतारा जिले का गन्ना दाम तय करने के लिए प्रभारी मंत्री शंभूराज देसाई की अध्यक्षता में अलग बैठक हुई। उसमें सार्वजनिक निर्माण मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले, विधायक अतुल भोसले, जिले की चीनी मिलों के अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और बैंक निदेशक मौजूद थे। बैठक में तय हुआ कि सांगली जिले की मिलें अंतिम दाम घोषित कर दें, उसके बाद सतारा की मिलों के निदेशक मंडल की बैठकें होंगी और अंतिम दाम पर चर्चा होगी।
प्रभारी मंत्री ने सुझाव दिया कि सतारा के गन्ने की रिकवरी देखकर दो जोन बनाए जाएं, एक 11 से 12 प्रतिशत रिकवरी का और दूसरा 12 प्रतिशत से ज्यादा का, और उसी हिसाब से दाम तय हो। बताया गया कि मौजूद लोगों ने इन सुझावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। लेकिन किसानों में यह भावना है कि आंदोलन से मिले 4200 रुपये के दाम पर अब अलग रुख अपनाया जा रहा है।
जिले के बड़े नेताओं से जुड़ी सहकारी और निजी चीनी मिलों का असर देखते हुए यह सवाल अब सिर्फ पैसे का नहीं रहा, राजनीतिक प्रतिष्ठा का भी बन गया है। चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने वाले नेता मिलों के मुद्दे पर एक साथ आ जाते हैं। किसान पूछ रहे हैं कि किसानों के हक के दाम के लिए वैसी एकजुटता क्यों नहीं दिखती। अपेक्षा है कि वे इस दाम पर भी पक्का रुख लें।
किसान पहले ही बढ़ती लागत, मजदूरी, खाद, दवाओं और सूखे जैसे हालात से परेशान हैं। गन्ने के दाम के फैसले के लिए उन्हें बार बार आंदोलन करना पड़ रहा है। इसलिए मांग जोर पकड़ रही है कि सिर्फ सकारात्मक चर्चा के आश्वासन नहीं, तय किया गया दाम असल में दिया जाए।
राजू शेलके ने कहा, "किसानों के गले पर पैर मत रखिए। 2029 में जनता भी बैठक करके तय करेगी कि किसे वोट देना है। राजू शेट्टी की अगुवाई में हमने किणी टोल नाके और नागठाणे में सौ प्रतिशत सफल आंदोलन किया। इससे किसानों को 4200 रुपये दाम मिलने का रास्ता खुला। हमें भरोसा दिया गया था कि यह दाम कोल्हापुर, सांगली और सतारा, तीनों जिलों में दिया जाएगा। प्रशासन ने वादा किया था कि कोल्हापुर में तय दाम सतारा और सांगली में भी माना जाएगा।"
उन्होंने आगे कहा, "अब अगर सतारा जिले के प्रभारी मंत्री बैठक करके कह रहे हैं कि गन्ने का दाम हम तय करेंगे, तो दिवाली के बाद हम मिल मालिकों को सबक सिखाएंगे। सड़क पर संघर्ष करने की नौबत आई तो उसके लिए भी हम तैयार हैं। दिवाली के बाद का संघर्ष चीनी मिल मालिकों को भारी पड़ेगा। गन्ने को तय दाम नहीं दिया गया तो चीनी सम्राटों का घमंड कैसे उतारना है, यह वक्त आने पर दिखा देंगे। इसलिए मिल मालिक समझदारी से काम लें और हमें फिर सड़क पर उतरने की नौबत न लाएं। अन्नदाता के हक के लिए हम कोई भी संघर्ष करने को तैयार हैं।"
किसानों में अब राजनीतिक जागरूकता की चर्चा है। संदेश यह है कि चुनाव में किसानों के नाम पर वोट मांगना और उनके आर्थिक हित का सवाल आने पर फैसले टाल देना आगे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जिले की नजर इस पर है कि मिल मालिक एकजुट हुए तो क्या किसान भी एकजुट होकर वोट के जरिए जवाब देंगे।


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