सऊदी अरब में हसन अल-फराज को फांसी, आरोप है कि कथित जुर्म 14 साल की उम्र के थे
सऊदी अरब सरकार ने 17 अक्टूबर को हसन झाकी अल-फराज को मृत्युदंड दिया। ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक उस पर लगे कुछ कथित जुर्म 14 साल की उम्र के थे।
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सऊदी अरब सरकार ने 17 अक्टूबर को हसन झाकी अल-फराज नाम के नौजवान को मृत्युदंड दे दिया। जिन जुर्मों के आरोप में उसे फांसी दी गई, उनमें से कुछ कथित जुर्म उसने सिर्फ 14 साल की उम्र में किए थे। इस कार्रवाई से दुनिया भर में हलचल मची है। मानवाधिकार की रक्षा करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसकी कड़ी निंदा की है और सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल उठाया है।
मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch, HRW) की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी प्रशासन ने हसन अल-फराज को 27 नवंबर 2017 को हिरासत में लिया था। उस पर शिया अल्पसंख्यक समुदाय के साथ कथित भेदभाव के खिलाफ हुए आंदोलन में शामिल होने का आरोप था। इसके अलावा आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत कई गंभीर जुर्म करने के आरोप भी उस पर लगाए गए थे।
करीब पांच साल चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 3 नवंबर 2022 को उसे मौत की सजा सुनाई गई। आखिरकार 17 अक्टूबर को यह सजा दे दी गई।
ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्चर जोई शिया ने इस केस की निष्पक्षता पर सीधे सवाल उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठनों का गंभीर आरोप है कि पूछताछ के दौरान सऊदी अधिकारियों ने अल-फराज पर बेहद अमानवीय जुल्म किया और उसे जबरदस्ती जुर्म कबूल करने पर मजबूर किया। दुनिया भर के कानून के जानकार कह रहे हैं कि जब किसी नाबालिग या किशोर उम्र के बच्चे के साथ ऐसा किया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।
यूरोपियन सऊदी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन ने भी इस मामले पर नजर रखी है। उसका दावा है कि सऊदी अरब में राजनीतिक या सामाजिक आंदोलनों में शामिल हुए कई नौजवानों को किशोर उम्र की हरकतों के लिए सीधे मौत की सजा सुनाई जा रही है। इन मामलों की वजह से सऊदी प्रशासन का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा विरोध हो रहा है।
हसन अल-फराज अकेला मामला नहीं है। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब की सर्वोच्च अदालत ने यूसुफ अल-मनासिफ नाम के एक और नौजवान की मौत की सजा बरकरार रखी है। यूसुफ पर भी 15 से 16 साल की उम्र में जुर्म करने का आरोप है। इसके अलावा बचपन में किए गए कथित जुर्मों के लिए कम से कम तीन और लोगों को मौत की सजा सुनाई गई है, जिस पर अमल कभी भी हो सकता है।
इससे पहले 14 अक्टूबर को सऊदी अरब में नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर नाम के दो बांग्लादेशी नागरिकों को फांसी दी गई थी। इसके बाद बांग्लादेश सरकार ने सऊदी प्रशासन से और स्पष्टीकरण मांगा। इन दोनों पर लगे आरोपों को लेकर परस्पर विरोधी जानकारी सामने आ रही है और कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई है। एक के बाद एक आ रही इन मौत की सजाओं से सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था को लेकर दुनिया भर की चिंता बहुत बढ़ गई है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) के बाल अधिकार समझौते (Convention on the Rights of the Child) के मुताबिक 18 साल से कम उम्र में किए गए किसी भी जुर्म के लिए मृत्युदंड या उम्रकैद देना पूरी तरह गैरकानूनी है। यूरोपियन सऊदी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन का आरोप है कि सऊदी अरब ने 2020 में नाबालिगों के लिए मौत की सजा खत्म करने का वादा किया था, लेकिन आतंकवाद विरोधी कानूनों का गलत इस्तेमाल करके नाबालिग रहते किए गए कामों के लिए नौजवानों को अब भी फांसी दी जा रही है।
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