सऊदी अरब पर हुथी विद्रोहियों का बड़ा हमला, 73 घायल, तेल निर्यात ठप; पाकिस्तान की जंग में उतरने की धमकी
यमन के हुथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब के चार शहरों पर एक साथ हमला बोला, जिसमें 73 से ज्यादा लोग घायल हो गए और रोजाना 4 लाख बैरल तेल की निर्यात रुक गई। इस हमले ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते यानी "इस्लामिक नाटो" की परीक्षा ले ली है।
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मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक हालात एकदम से बहुत खतरनाक मोड़ पर पहुंच गए हैं। यमन में ईरान समर्थित हुथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब के अहम सैन्य और आर्थिक ठिकानों पर एक साथ हमले करके पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। इन हमलों में सऊदी अरब के चार बड़े शहरों को निशाना बनाया गया, जिसमें 73 से ज्यादा नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि इस हमले की वजह से सऊदी अरब की रोजाना 4 लाख बैरल तेल की निर्यात पूरी तरह ठप हो गई है, जिससे ग्लोबल फ्यूल मार्केट में हड़कंप मच गया है।
इस बड़े संकट ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने मिलकर बनाए तीन-स्तरीय सुरक्षा गठबंधन पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, जिसे दुनिया "इस्लामिक नाटो" के नाम से जानती है। सऊदी पर इतना बड़ा हमला होने के बावजूद पाकिस्तान और तुर्किए ने शुरुआत में सीधी सैन्य मदद भेजने में जो देरी दिखाई, उससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई थी कि यह करार सिर्फ कागज पर ही सीमित तो नहीं रह गया।
कुछ महीने पहले ही सऊदी अरब के अल-सफा पैलेस में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच "मक्का संयुक्त रक्षा समझौते" पर दस्तखत हुए थे। इस समझौते की मूल सोच पश्चिम के नाटो सैन्य संगठन के आर्टिकल 5 पर आधारित है। इस करार के नियमों के मुताबिक, तीनों देशों में से किसी एक देश पर हुआ सैन्य हमला तीनों देशों पर हुआ सीधा हमला माना जाएगा और तीनों देश मिलकर उसका सैन्य जवाब देंगे। इसके अलावा इसमें खुफिया जानकारी की अदला-बदली, साझा सैन्य अभ्यास और आधुनिक रक्षा तकनीक की सप्लाई भी शामिल है। पाकिस्तान की भारी सैन्य ताकत और परमाणु हथियार, तुर्किए के एडवांस्ड ड्रोन और हथियार बनाने की क्षमता, और सऊदी अरब का बेशुमार पैसा, इन तीनों के जुड़ने को ही "इस्लामिक नाटो" कहा जा रहा था।
हुथियों के हमले के बाद कुछ समय चुप्पी साधे बैठी पाकिस्तान सरकार पर सऊदी और इंटरनेशनल हलकों से दबाव बढ़ता गया। सऊदी अरब में पहले से ही 8,000 पाकिस्तानी सैनिक तैनात हैं, वहीं आगे जरूरत पड़ने पर 80,000 सैनिक भेजने का वादा पाकिस्तान पहले ही कर चुका है।
बढ़ती आलोचना के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने जियो टीवी को दिए एक खास इंटरव्यू में अपना पक्ष साफ किया। उन्होंने कहा, "मक्का करार सिर्फ औपचारिक कागजात नहीं हैं। इस करार के तहत हम सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए बंधे हुए हैं और इसमें किसी शक की गुंजाइश नहीं है। अगर यमन के हुथी विद्रोही या दूसरे गैर-सरकारी गुट सीमा पार करके सऊदी पर खुलेआम हमला करते रहे, तो यह करार लागू किया जाएगा और पाकिस्तान सैन्य जवाब देगा।"
पाकिस्तान और तुर्किए के लिए इस करार को सीधे अमल में लाना आसान नहीं है। यमन के हुथी विद्रोहियों को ईरान का सीधा समर्थन हासिल है। पाकिस्तान की सीमा ईरान से सीधे जुड़ी होने और देश के अंदर धार्मिक समीकरण संवेदनशील होने की वजह से सीधे ईरान समर्थित गुटों के खिलाफ जंग में उतरना पाकिस्तान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। दूसरी तरफ तुर्किए खुद नाटो का सदस्य है और मिडिल ईस्ट की इस जंग से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
बहरहाल, सऊदी के तेल क्षेत्रों पर हुए हमलों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बनी अनिश्चितता को देखते हुए, यह करार आगे चलकर असली कार्रवाई में बदलेगा या कूटनीतिक बातचीत में ही उलझा रह जाएगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।