पूर्व जज के. चंद्रू का कॉलेजियम पर सवाल, जजों की नियुक्ति में भगवाकरण का आरोप
मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति के. चंद्रू ने एक परिसंवाद में कॉलेजियम व्यवस्था और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
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मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति के. चंद्रू ने जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। एशियन कॉलेज ऑफ जर्नालिज्म की ओर से आयोजित "हू विल जज द जजेज?" विषय के परिसंवाद में बोलते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने जजों की नियुक्ति के लिए स्थायी व्यवस्था न बनाने को लेकर केंद्र सरकार और न्यायव्यवस्था की आलोचना की।
"जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था यानी संवैधानिक सत्तापलट" विषय पर बोलते हुए चंद्रू ने कई दावे किए। उनका आरोप है कि जजों की नियुक्ति में भगवाकरण बढ़ता जा रहा है। चंद्रू के मुताबिक एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों के नामों को मंजूरी मिल जाती है, जबकि दूसरों की नियुक्तियां लटकी रहती हैं।
चंद्रू ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ने 2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाने की कोशिश की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वह कानून रद्द कर दिया। उसके बाद कानून में सुधार करके नया आयोग बनाने की जगह कॉलेजियम व्यवस्था को ही जारी रखा गया।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर NJAC की बनावट में सदस्यों के संतुलन को लेकर किसी को आपत्ति थी, तो उसमें बदलाव करके नया आयोग बनाया जा सकता था। चंद्रू के अनुसार कॉलेजियम की प्रक्रिया बंद दरवाजों के पीछे चलती है, इसलिए पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
चंद्रू ने उदाहरण के तौर पर न्यायमूर्ति व्हिक्टोरिया गौरी की नियुक्ति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को लेकर कथित आपत्तिजनक बयान देने के आरोपों के बावजूद उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी गई। इसके उलट, एडवोकेट जॉन सत्यन के नाम की कॉलेजियम ने दोबारा सिफारिश की, फिर भी उनकी नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी गई।
चंद्रू ने यह दावा भी किया कि जजों के चयन में एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों की नियुक्तियों को जानबूझकर प्राथमिकता दी जाती है।
चंद्रू ने सुझाव दिया कि जजों की नियुक्ति के लिए सिर्फ मौजूदा तरीके पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। कानून के प्रोफेसरों और जाने-माने विधि विशेषज्ञों पर भी विचार होना चाहिए। उन्होंने ध्यान दिलाया कि अमेरिका में यूनिवर्सिटियों के प्रोफेसर भी जज के पद पर नियुक्त होते हैं। उनका मत है कि जजों की नियुक्ति का सवाल पूरे देश से जुड़ा है, इसलिए इसके लिए पारदर्शी और स्थायी व्यवस्था होनी चाहिए।