शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

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पुणे पदवीधर चुनाव में हर्षदा देशमुख-जाधव जीतीं, स्मिता जाधव को उतारने का भाजपा का दांव नहीं चला

पुणे पदवीधर चुनाव में हर्षदा देशमुख-जाधव जीतीं, स्मिता जाधव को उतारने का भाजपा का दांव नहीं चला तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

पुणे पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की हर्षदा देशमुख-जाधव ने जीत दर्ज की, जबकि भाजपा को उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली।

पुणे पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में भाजपा को वह कामयाबी नहीं मिली, जिसकी उसे उम्मीद थी। सत्ता, संगठन और एक प्रभावशाली राजनीतिक घराने का साथ होने के बावजूद, और जीत के लिए पूरी ताकत झोंकने के बाद भी नतीजा पार्टी के हक में नहीं गया। यह सीट भाजपा ने 2020 में गंवा दी थी और उसे वापस पाने के लिए पार्टी ने कोल्हापुर के प्रभावशाली जाधव घराने की स्मिता जाधव को ऐन वक्त पर पार्टी में शामिल कर उम्मीदवार बनाया। लेकिन इस चौंकाने वाले दांव का वैसा असर नहीं दिखा, जैसा सोचा गया था।

राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरदचंद्र पवार गुट की हर्षदा देशमुख-जाधव ने जीत हासिल की और इस तरह भाजपा की रणनीति को झटका दिया। इस नतीजे के बाद उम्मीदवार चुनने की सियासत, पार्टी के भीतर की नाराजगी और संगठन की ताकत को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रभावशाली सरनेम और सत्ता की ताकत के बावजूद भाजपा का हिसाब कहां गड़बड़ाया। क्या विरोधियों ने भाजपा को हराया, या अपनी ही रणनीति की कमियों ने हार का रास्ता खोला? इस सवाल का जवाब ही आने वाले चुनावों के लिए पार्टी की दिशा तय करेगा।

यह निर्वाचन क्षेत्र पुणे, सातारा, सांगली, कोल्हापुर और सोलापुर, इन पांच जिलों में फैला है। इसमें 47 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन मुख्य मुकाबला स्मिता जाधव और हर्षदा देशमुख-जाधव के बीच ही रहा। चर्चा थी कि मौजूदा विधायक अरुण लाड के बेटे शरद लाड और अजित पवार गुट के नेता भैया माने भी उम्मीदवार बनना चाहते थे। आखिर में मौका स्मिता जाधव को मिला, तो यह सवाल उठा कि क्या इससे स्थानीय दावेदारों के समर्थकों में नाराजगी पैदा हुई।

भैया माने ने निर्दलीय के तौर पर नामांकन दाखिल किया था, लेकिन बाद में नाम वापस ले लिया। इस पृष्ठभूमि में दावेदारों के समर्थकों ने प्रचार में कितना सक्रिय हिस्सा लिया, इसका जवाब भाजपा के अपने आत्ममंथन से ही मिल सकता है।

स्मिता जाधव का कांग्रेस नेता सतेज उर्फ बंटी पाटील से रिश्ता है, इसलिए उम्मीद थी कि कोल्हापुर के सियासी समीकरणों का फायदा मिलेगा। लेकिन कांग्रेस ने महाविकास अघाड़ी का धर्म निभाते हुए हर्षदा देशमुख-जाधव के समर्थन में रुख अपनाया। यानी निजी रिश्तों से ऊपर सियासी प्रतिबद्धता रही। साथ ही बाहर से आए उम्मीदवार को तरजीह मिलने से भाजपा के पारंपरिक कार्यकर्ताओं में बेचैनी हुई या नहीं, इस पर भी चर्चा चल रही है।

दूसरी तरफ हर्षदा देशमुख-जाधव को शरद पवार की अगुवाई और महाविकास अघाड़ी के तालमेल का फायदा मिला। प्रभाकर देशमुख की बेटी होने के नाते पुणे, सातारा और सांगली इलाके में उनके संपर्क भी अहम साबित हुए। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सुनील मोदी मैदान में थे, फिर भी वोटों के बंटवारे का भाजपा को वह फायदा नहीं मिला, जिसकी उसे उम्मीद थी।

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