फ्रांस में महंगाई के खिलाफ सड़कों पर 8 लाख लोग, हिंसा के बीच 1,200 से ज्यादा हिरासत में
फ्रांस में बढ़ती महंगाई, ईंधन के दाम और बिगड़ती सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ आंदोलन हिंसक हो गया। पेरिस से लिमोज तक आगजनी और लूटपाट हुई।
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फ्रांस इस वक्त बड़े सामाजिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। बढ़ती महंगाई, ईंधन के आसमान छूते दाम और बिगड़ती सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ शनिवार को देशभर में करीब आठ लाख लोग सड़कों पर उतर आए। आंदोलन में शामिल लोगों में छात्र, मजदूर संगठन और 2018 के येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े रहे लोग भी थे।
राजधानी पेरिस में आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के सरकारी निवास एलिसी पैलेस से सिर्फ 400 मीटर की दूरी पर प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियां जला दीं और पुलिस पर पत्थर फेंके। हालात काबू में करने के लिए प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। देशभर में अब तक 1,200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है।
सबसे बड़ी घटना लिमोज शहर में हुई। वहां नकाब पहने कुछ उपद्रवी प्रदर्शनकारियों ने टाउन हॉल में आग लगा दी। यह इमारत 143 साल पुरानी थी और ऐतिहासिक धरोहर मानी जाती थी। आग में पूरी इमारत जलकर खाक हो गई। प्रशासन ने इस हरकत की कड़ी निंदा की है। देश के करीब 10 बड़े शहरों में लूटपाट की घटनाएं भी हुईं।
इस आंदोलन की शुरुआत एक छोटी सी घटना से हुई थी। 21 सितंबर को पेरिस के एक बेहद गरीब इलाके के स्कूल Lycée Saint-Exupéry में छात्रों ने हड़ताल की थी। उनकी मांग थी कि स्कूल में टीचरों की भारी कमी दूर हो, पढ़ाई के पूरे साधन मिलें और जर्जर इमारतों की मरम्मत हो। प्रशासन ने 29 सितंबर को कुछ अतिरिक्त स्टाफ भेजकर वहां की हड़ताल शांत करा दी, लेकिन तब तक बाकी स्कूलों में नाराजगी की चिंगारी पहुंच चुकी थी।
सिर्फ आठ दिन में यह आंदोलन फ्रांस के 410 स्कूलों में फैल गया। स्कूली बच्चों के बाद यूनिवर्सिटी के नौजवान भी जुड़ गए। कुछ ही दिनों में उनके माता-पिता, शिक्षक संगठन और देश के बड़े मजदूर संगठन भी उनके साथ खड़े हो गए। इस तरह एक छोटे स्कूल से शुरू हुआ आंदोलन देश की सबसे बड़ी सामाजिक मुहिम बन गया।
आंदोलन को ज्यादा उग्र बनाने की बड़ी वजह 5 अक्टूबर को उत्तर फ्रांस के लेन्स शहर में हुई घटना रही। प्रदर्शन के दौरान पुलिस से झड़प में पुलिस के आंसू गैस या बचाव उपकरण (ग्रेनेड) के धमाके से एक 15 साल के छात्र का हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। खबर तेजी से फैली और पुलिस की सख्ती के खिलाफ लोगों में भारी गुस्सा भड़क उठा।
फ्रांस के इतिहास में स्कूली छात्रों के किसी आंदोलन में इतनी हिंसा पहले नहीं देखी गई थी। अब तक 200 से ज्यादा छात्र, 85 स्कूल कर्मचारी और 700 से ज्यादा पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। आंदोलन को दबाने के लिए प्रशासन ने 6,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया था। इनमें ज्यादातर नाबालिग थे, इसलिए बाद में उन्हें बिना किसी गंभीर आरोप के छोड़ दिया गया।
कई शहरों में उपद्रवी नौजवानों के गिरोहों ने हालात का फायदा उठाया। चेहरे पर नकाब और हाथों में दस्ताने पहने नौजवानों ने सुपरमार्केट, दवा की दुकानों, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ों और बड़े ब्रांड के शोरूम में तोड़फोड़ कर लूटपाट की। AFP की जानकारी के मुताबिक ये गिरोह पूरी योजना से काम कर रहे थे। दुकान लूटने से पहले सीसीटीवी कैमरे बंद या तोड़ दिए जाते थे और फिर मुख्य शीशे तोड़कर अंदर घुसा जाता था।
इस सबमें 2018 के मशहूर येलो वेस्ट आंदोलन का असर साफ दिख रहा है। सोशल मीडिया पर उस आंदोलन को फिर जिंदा करने की अपील की गई थी। फ्रांस के कानून के मुताबिक हर वाहन चालक को इमरजेंसी के लिए गाड़ी में चमकीली पीली जैकेट रखनी होती है। 2018 में ईंधन पर टैक्स बढ़ा, तब लोगों ने इसी जैकेट को अपने आंदोलन का निशान बना लिया था। अब महंगाई के खिलाफ लोग फिर पीली जैकेट पहनकर सड़कों पर हैं और सरकार हिल गई है।