बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

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22:44 IST

नीट यूजी: दिव्यांग कोटे की सीट के लिए फर्जी कागज, दून मेडिकल कॉलेज की जांच में पकड़े गए उम्मीदवार

दिव्यांग कोटे से एमबीबीएस सीट पाने पहुंचे कई उम्मीदवार मेडिकल बोर्ड की जांच में पूरी तरह फिट निकले।

नीट यूजी: दिव्यांग कोटे की सीट के लिए फर्जी कागज, दून मेडिकल कॉलेज की जांच में पकड़े गए उम्मीदवार तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

एमबीबीएस की एक-एक सीट के लिए नीट यूजी में कड़ी होड़ रहती है। जनरल और दूसरी श्रेणियों में मुकाबला बहुत तेज होने की वजह से कई उम्मीदवार दिव्यांग (PwD) कोटे से परीक्षा देते हैं। यह आरक्षण काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान मिलता है और शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे जरूरतमंद व मेहनती विद्यार्थियों के लिए बड़ी मदद है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से आए एक मामले ने मेडिकल काउंसलिंग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया गया है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के कुछ उम्मीदवार नीट यूजी के दिव्यांग कोटे की सीट पाने के लिए देहरादून के मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे। इन्होंने फर्जी कागजात के सहारे खुद को दिव्यांग साबित करने की कोशिश की थी। लेकिन राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की ओर से नियुक्त विशेषज्ञ डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड की जांच में यह गड़बड़ी पकड़ में आ गई।

नीट यूजी काउंसलिंग के तहत दिव्यांग श्रेणी की एमबीबीएस सीट पर दावा करने वाले उम्मीदवार दून मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल पहुंचे थे। अस्पताल में डॉ. आरएस बिष्ट की अध्यक्षता में एक खास मेडिकल बोर्ड बनाया गया था। इसमें नेत्र रोग, हड्डी रोग (ऑर्थो) और दूसरे विभागों के विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल थे।

यूपी, उत्तराखंड, बिहार और महाराष्ट्र से कुल 18 उम्मीदवार जांच के लिए आए थे। नेत्र रोग और ऑर्थो विभाग की जांच में कई ऐसे विद्यार्थी पकड़े गए, जो खुद को 40 से 50 प्रतिशत तक दिव्यांग बता रहे थे, जबकि असल में वे पूरी तरह फिट थे।

नेत्र रोग विभाग का मामला देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए। इस विभाग में जांच के लिए पहुंचे तीन उम्मीदवारों, यानी उत्तराखंड के दो विद्यार्थियों और बिहार की एक छात्रा, ने अपने कागजात में खुद को 40 से 50 प्रतिशत तक दृष्टिबाधित (Blind/Visually Impaired) दिखाया था। मगर डॉक्टरों ने जब उनकी आंखों की क्लिनिकल और मशीनों से जांच की, तो उन्हें बोर्ड पर लिखे छोटे अक्षर और चार्ट पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मशीनों की रिपोर्ट में भी उनकी आंखों में किसी तरह की दिव्यांगता की पुष्टि नहीं हुई।

हड्डी रोग विभाग की जांच में भी चौंकाने वाली बात सामने आई। महाराष्ट्र से आई एक छात्रा ने पैरों की दिव्यांगता 40 प्रतिशत बताई थी, पर जांच में उसकी दिव्यांगता सिर्फ 12 प्रतिशत निकली। यह नीट काउंसलिंग के तय मापदंड, यानी कम से कम 40 प्रतिशत, से काफी कम है। उत्तर प्रदेश से आई एक छात्रा ने 45 प्रतिशत दिव्यांगता का दावा किया था। डॉक्टरों ने जब उससे कड़ी पूछताछ शुरू की और कागजात पर सवाल उठाए, तो वह जांच पूरी किए बिना ही वहां से चली गई। कई और उम्मीदवार भी सख्त जांच देखकर लौट गए और दोबारा मेडिकल बोर्ड के सामने नहीं आए।

अब उस व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिसके तहत उम्मीदवारों को गलत आंकड़ों वाले दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी हुए। जब असल में कोई दिव्यांगता नहीं थी, तो ये प्रमाणपत्र बने कैसे? दून मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड ने जांच में पात्र पाए गए 13 असली उम्मीदवारों के प्रमाणपत्र अपलोड कर दिए हैं। ऐसे फर्जीवाड़े से देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की पारदर्शिता पर दाग लगा है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई न हुई, तो असली जरूरतमंद दिव्यांग विद्यार्थी अपने हक की सीट से वंचित रह जाएंगे।

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