निजी स्कूलों की मान्यता के अधिकार शिक्षा मंत्री भुसे से लेकर प्रधान सचिव को सौंपे गए
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के फैसले से स्कूल शिक्षा विभाग में इरादापत्र और मान्यतापत्र देने का काम अब प्रधान सचिव के पास रहेगा। महायुती में अधिकारों के बंटवारे पर चर्चा तेज है।
महाराष्ट्र की सत्ताधारी महायुति सरकार में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच अधिकारों को लेकर चर्चा फिर शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के एक और मंत्री के विभाग से अहम प्रशासनिक अधिकार लेकर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को सौंप दिए हैं। इनमें सचिव और शिक्षा आयुक्त जैसे अधिकारी शामिल हैं। मामला स्कूल शिक्षा विभाग का है और इससे मंत्रियों के अधिकारों की सीमा और सरकार की निर्णय प्रक्रिया पर नए सवाल उठ रहे हैं।
इस फैसले का असर स्कूल शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे पर पड़ा है। निजी स्व-वित्तपोषित स्कूलों की मान्यता प्रक्रिया में सरकार ने बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया है। अब पहले से चल रहे स्कूलों का दर्जा बढ़ाने के लिए आशय पत्र और मान्यता पत्र देने का अधिकार शिक्षा मंत्री के पास नहीं रहेगा। यह अधिकार प्रधान सचिव (स्कूल शिक्षा) को दे दिया गया है। इस बारे में सरकार ने 3 सितंबर को सरकारी परिपत्र जारी किया था।
नतीजा यह होगा कि निजी स्कूलों की मान्यता और दर्जा बढ़ाने से जुड़े अहम फैसले सीधे प्रशासनिक स्तर पर होंगे। बताया जा रहा है कि इस बदलाव का मकसद शिक्षा विभाग में फैसले जल्दी करना और कामकाज में एकरूपता लाना है।
भुसे के जिन अधिकारों में कटौती हुई है, उनमें निजी स्कूलों की मान्यता प्रक्रिया से जुड़े फैसले शामिल हैं। साथ ही स्कूलों को अतिरिक्त सेक्शन मंजूर करना और नई शाखाओं को इजाजत देना भी इसमें आता है। सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रमों के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र देने का काम भी इसी सूची में है।
शिंदे गुट के मंत्रियों के साथ ऐसा पहले भी हुआ है। परिवहन विभाग की निर्णय प्रक्रिया पर मुख्यमंत्री का नियंत्रण बढ़ने की चर्चा हुई थी। मंत्री प्रताप सरनाईक के मराठी भाषा अनिवार्य करने वाले फैसले में दखल की बात भी कही गई थी। इसके अलावा मंत्री संजय राठौड़, गुलाबराव पाटिल, उदय सामंत और शंभूराज देसाई के दफ्तरों में कुछ निजी सहायकों और एसडीओ को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बदलाव हुए थे।
मुख्यमंत्री के अधिकारों का दायरा सरकार की ओर से 14 अगस्त को अधिसूचित "महाराष्ट्र सरकार कार्य नियमावली 2026" से भी साफ होता है। इन नियमों के मुताबिक जनहित में जरूरत हो तो मुख्यमंत्री किसी भी मंत्री का फैसला बदल सकते हैं। इसके लिए संबंधित कारण लिखित में दर्ज करना जरूरी है। नियमों के तहत मुख्यमंत्री किसी भी विभाग के अहम फैसलों के कागजात भी मंगवा सकते हैं।
सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि ये बदलाव प्रशासनिक कार्यक्षमता और फैसलों में एकरूपता के लिए हैं। फिर भी महायुति के सत्ता समीकरणों को देखते हुए इसे अलग नजर से देखा जा रहा है। शिंदे गुट के मंत्रियों के विभागों में लगातार प्रशासनिक फेरबदल होने से दोनों पक्षों के बीच अधिकारों के बंटवारे और तालमेल जैसे मुद्दे सामने आ गए हैं। राजनीतिक हलकों की नजर इस पर है कि मुख्यमंत्री के इन फैसलों से सरकार के भीतर सत्ता का संतुलन कैसे बदलता है।
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