नागपुर सेंट्रल जेल में विचाराधीन बंदी की पिटाई, सिर पर बाल्टी से वार, तीन पर केस
मंगलवार सुबह जेल के भीतर विचाराधीन कैदियों के बीच हुई मारपीट में एक कैदी के सिर में चोट आई। जेल प्रशासन की शिकायत पर धंतोली पुलिस ने तीन कैदियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
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नागपुर सेंट्रल जेल के अंदर बंदियों के बीच हिंसा का एक और मामला सामने आया है। मंगलवार की सुबह एक विचाराधीन बंदी को पहले लात-घूंसों से पीटा गया, फिर उसके सिर पर प्लास्टिक की बाल्टी दे मारी गई। सिर में चोट लगी है। जेल के कर्मचारी वक्त पर पहुंच गए, उन्होंने मामला काबू में किया और जख्मी बंदी को जेल के अस्पताल में भर्ती करा दिया।
जानकारी के मुताबिक वारदात मंगलवार को सुबह करीब 9.40 से 10.20 बजे के बीच हुई। जगह जेल का छोटी गोल विभाग थी, जहां बैरक नंबर 7 और 8 के बीच की खाली जगह में यह सब हुआ। पीड़ित विजय रहांगडाले जेल के हनुमान मंदिर में दर्शन करने के बाद अपनी बैरक की ओर लौट रहे थे। तभी दो और विचाराधीन बंदी, दुर्गेश उर्फ लिटिल प्रमोद गुप्ता और अश्विन उर्फ अच्छी मुकुंद इंदुरकर, उनके सामने आ गए और रास्ता रोक लिया। आरोप है कि दोनों उन पर टूट पड़े। शुरुआत लात-घूंसों से हुई और बताया जाता है कि बाद में बाल्टी से उनके सिर पर भी वार किया गया।
अचानक शुरू हुई इस मारपीट से जेल परिसर में अफरातफरी मच गई। विजय की चीख-पुकार सुनकर ड्यूटी पर मौजूद जेल कर्मचारी मनोज धनवट और उनके कुछ साथी दौड़कर पहुंचे। उन्होंने दोनों तरफ के बंदियों को एक-दूसरे से दूर किया और घायल विजय को इलाज के लिए जेल अस्पताल पहुंचाया।
कर्मचारी की बात पर भी भड़का एक बंदी
हालात संभाले जा ही रहे थे कि इसी बीच एक और विचाराधीन बंदी का जेल स्टाफ से झगड़ा हो गया। पुलिस को दी गई शिकायत में इस बंदी का नाम सुरेंद्र उर्फ मोनू मनोज समुद्रे बताया गया है। सब-इंस्पेक्टर निमजे ने उसे शांत कराने की कोशिश की, मगर आरोप है कि वह मानने के बजाय और उलझता गया, उन पर झपटने की कोशिश की और सरकारी काम में लगे कर्मचारी को धमकाया भी।
इसके बाद जेल प्रशासन ने धंतोली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने दुर्गेश उर्फ लिटिल गुप्ता, अश्विन उर्फ अच्छी इंदुरकर और सुरेंद्र उर्फ मोनू समुद्रे, इन तीनों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। सरकारी ड्यूटी में रुकावट डालने और धमकी देने के आरोप का मामला भी इसी शिकायत से पुलिस तक पहुंचा है।
जेल की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल
इस वारदात से जेल के भीतर की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर उंगली उठी है। सवाल यह है कि बंदियों के आपसी झगड़े मारपीट तक पहुंचने से पहले रोकने के लिए निगरानी और इंतजाम कितने कारगर हैं। बंदी खुद कितने महफूज हैं, यह भी पूछा जा रहा है। साथ ही, जिन कर्मचारियों के भरोसे सैकड़ों बंदी हैं, उनकी अपनी हिफाजत का ख्याल कौन रख रहा है, यह बात भी उठ रही है।
अब सबकी नजर जेल प्रशासन पर है कि वह इसे सिर्फ एक आपराधिक मामला मानकर छोड़ देता है या जेल की अंदरूनी सुरक्षा की ठीक से समीक्षा भी करता है।