मुंबई में पुरानी इमारतों का पुनर्विकास तेज, 2031 तक करीब 59 हजार नए घर मुमकिन
नाइट फ्रैंक इंडिया के अंदाजे के मुताबिक चल रहे पुनर्विकास प्रोजेक्ट से 2031 तक मुंबई में करीब 59 हजार नए घर मिल सकते हैं।
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मुंबई में नई इमारतें बनाने के लिए खाली जमीन कम होती जा रही है। ऐसे में पुरानी इमारतों के पुनर्विकास की रफ्तार बढ़ रही है। डेवलपर अब सिर्फ इमारतों की मरम्मत तक नहीं रुक रहे, उनका जोर पूरे इलाके की सूरत बदलने पर है। नाइट फ्रैंक इंडिया के अंदाजे के मुताबिक, अभी चल रहे पुनर्विकास प्रोजेक्ट से 2031 तक मुंबई में करीब 59 हजार नए घर उपलब्ध हो सकते हैं। इससे शहर के रियल एस्टेट सेक्टर में बड़े बदलाव की उम्मीद है।
मुंबई में पुनर्विकास के प्रोजेक्ट लगातार बढ़ रहे हैं और हाउसिंग सोसाइटियां भी इसमें दिलचस्पी दिखा रही हैं। नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल मुंबई में पुरानी इमारतों के पुनर्विकास में 16 टक्के की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2026 की पहली तिमाही में सहकारी हाउसिंग सोसाइटियों ने करीब 52 एकड़ इलाके को शामिल करते हुए 70 पुनर्विकास करार किए।
अब डेवलपर किसी एक इमारत को दोबारा बनाने तक सीमित नहीं हैं। वे क्लस्टर पुनर्विकास के जरिए पूरे इलाके को एक साथ विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। इससे बुनियादी सुविधाओं, खुली जगहों और रहने वालों को मिलने वाली सहूलियतों को बेहतर करने का मौका बनता है।
पुरानी इमारतों का मसला काफी गंभीर है। अंदाजा है कि मुंबई की आधे से ज्यादा रिहायशी इमारतें 30 साल से पुरानी हैं। ये पुराने निर्माण नियमों के हिसाब से बनी थीं, इसलिए कई जगह ढांचे की मजबूती, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं का सवाल खड़ा हो गया है। वक्त के साथ इमारतों की हालत बिगड़ती है, जगह कम पड़ती है, हवा की आवाजाही कम रहती है और सुविधाएं पुरानी हो जाती हैं। इन सबसे रहने वालों को परेशानी झेलनी पड़ती है।
आज के घर खरीदार बड़े घर, आधुनिक सुरक्षा इंतजाम, अच्छी हवादारी और पर्यावरण के अनुकूल सुविधाएं चाहते हैं। पुनर्विकास में पुरानी इमारत की जगह आधुनिक घर बनते हैं और इन जरूरतों को पूरा करने का मौका भी मिलता है।
अंधेरी, बांद्रा, सांताक्रूज, खार, विलेपार्ले, बोरीवली और गोरेगांव जैसे उपनगरों में पुनर्विकास की हलचल बढ़ रही है। मेट्रो कनेक्टिविटी और कमर्शियल डेवलपमेंट की वजह से मुलुंड, चेंबूर और कुर्ला का भी महत्व बढ़ रहा है। दक्षिण मुंबई के साथ दादर, माहिम, माटुंगा, परेल, भायखला और वरली के कुछ हिस्सों में भी पुरानी रिहायशी इमारतों के पुनर्विकास को रफ्तार मिल रही है। क्लस्टर पुनर्विकास से अलग-अलग इमारतों से आगे बढ़कर पूरे इलाके के नियोजित विकास की संभावना बढ़ रही है।
डेवलपरों के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। रहने वालों की सहमति लेना, नियामक मंजूरियां, आर्थिक व्यवहार्यता, पारदर्शी बातचीत और तय वक्त में काम पूरा करना बेहद अहम है। लॉयड्स रियल्टी डेवलपर्स लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रवि अग्रवाल ने कहा कि इसी वजह से डेवलपर की आर्थिक ताकत, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का तजुर्बा और काम पूरा करने की साख को खास अहमियत मिल गई है।
नाइट फ्रैंक के अंदाजे में चल रहे प्रोजेक्ट से 2031 तक करीब 59 हजार नए घर मिल सकते हैं। इस सेक्टर के आने वाले बड़े दौर की अनुमानित कीमत करीब 1.5 ट्रिलियन रुपये बताई गई है। सरकारी नीतियां, बुनियादी ढांचे में निवेश, विकास नियंत्रण नियमों में सुधार और खुद पुनर्विकास को मिल रहा प्रोत्साहन इस सेक्टर को रफ्तार दे रहे हैं। हालांकि प्रोजेक्ट असल में कब पूरे होंगे, यह मंजूरियों, आर्थिक व्यवहार्यता और अमल की रफ्तार पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर मुंबई में पुनर्विकास अब सिर्फ पुरानी इमारतों की जगह नई इमारतें खड़ी करने तक सीमित नहीं रहा। आधुनिक घरों, बेहतर सुविधाओं और नियोजित शहरी विकास के जरिए शहर की सूरत बदलने का मौका इससे बन रहा है।