मुंबई के वाडिया अस्पताल में 17 साल के तन्मय शिंदे का पहला कामयाब हार्ट ट्रांसप्लांट
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मुंबई के बाई जेरबाई वाडिया हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन में 17 साल के तन्मय शिंदे का हार्ट ट्रांसप्लांट कामयाबी से हो गया। गंभीर हृदय रोग की वजह से उसकी जान खतरे में थी। उसके दिल की काम करने की ताकत बहुत कम रह गई थी, इसलिए ट्रांसप्लांट उसके लिए बेहद जरूरी हो गया था। यह ऑपरेशन बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बिस्वा पांडा की अगुवाई में हुआ।
तन्मय नवी मुंबई के घणसोली में रहता है। 1 दिसंबर को वाशी के एक अस्पताल में उसे डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी नाम की बीमारी निकली। पांच दिन इलाज के बाद उसे घर भेज दिया गया, लेकिन हफ्ते भर के अंदर ही उसे सांस फूलने, सीने में दर्द और थकान की शिकायत होने लगी। तबीयत बिगड़ने पर उसे फिर अस्पताल ले जाया गया और 15 दिसंबर को गंभीर हालत में वाडिया अस्पताल में भर्ती किया गया। यहां डॉ. बिस्वा पांडा की देखरेख में आगे की जांच और खास इलाज शुरू हुआ।
डॉ. पांडा ने बताया कि इस बीमारी में दिल की मांसपेशियां कमजोर पड़ जाती हैं। इससे शरीर की जरूरत के हिसाब से खून पंप करने की दिल की ताकत घटती है और धीरे-धीरे दिल फेल होने का खतरा बढ़ता जाता है। खून पंप करने की क्षमता बताने वाला इजेक्शन फ्रैक्शन (EF) आम तौर पर 55 से 65 फीसदी होता है। तन्मय का EF शुरू में 25 से 30 फीसदी तक गिर गया था। हालत और बिगड़ी तो यह 10 से 15 फीसदी तक आ गया। आईसीयू के इलाज और दवाओं से यह कुछ वक्त के लिए 20 से 25 फीसदी तक सुधरा।
तन्मय को 28 जनवरी को अस्पताल से छुट्टी मिली, मगर घर जाकर भी उसकी हालत नाजुक ही रही और आगे के इलाज व निगरानी के लिए उसे बार-बार भर्ती करना पड़ा। करीब छह महीने पहले डॉक्टरों की टीम ने उसके परिवार को उसकी हालत बताई और ट्रांसप्लांट की जरूरत समझाई। इसके बाद झोनल ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC) के जरिए उसका नाम हार्ट ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में दर्ज हुआ। तन्मय और उसका परिवार सही डोनर के दिल का इंतजार करता रहा।
हार्ट ट्रांसप्लांट में डोनर और मरीज का ब्लड ग्रुप मिलना जरूरी होता है। दोनों की उम्र, वजन और शरीर के आकार का भी ध्यान रखा जाता है। छोटे बच्चों और किशोरों के लिए सही साइज का दिल मिलना बड़ी चुनौती है।
6 अक्टूबर को डॉक्टरों की टीम को खबर मिली कि मुलुंड के फोर्टिस अस्पताल में एक सही डोनर मौजूद है। ब्रेन डेड हुए 22 साल के एक नौजवान के परिवार ने अंगदान का फैसला किया था। इससे तन्मय के ट्रांसप्लांट का रास्ता खुल गया। जरूरी मेडिकल जांच और ZTCC के नियमों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह दिल तन्मय को दिया गया।
डॉ. पांडा के मुताबिक ट्रांसप्लांट में वक्त का हिसाब बहुत अहम होता है। डोनर के शरीर से दिल निकालने के बाद उसे ठीक से संभालकर कम से कम वक्त में पहुंचाना पड़ता है। ग्रीन कॉरिडोर की बदौलत मुलुंड के फोर्टिस अस्पताल से वाडिया अस्पताल तक का 23.9 किलोमीटर का फासला सिर्फ 25 मिनट में तय हो गया। दिल निकालने का काम चल ही रहा था कि वाडिया की टीम ने तन्मय को ऑपरेशन के लिए तैयार कर लिया। डॉ. पांडा ने कहा कि डोनर और मरीज को देखने वाली दोनों टीमों ने तालमेल से काम किया, इसलिए दिल पहुंचते ही ऑपरेशन शुरू हो सका।
ऑपरेशन में दिल से जुड़ने वाली मुख्य रक्त वाहिकाओं और नसों को ध्यान से जोड़ा गया। फिर ट्रांसप्लांट किया हुआ दिल नियमित रूप से धड़कने लगा। डोनर का दिल रुकने से लेकर तन्मय के शरीर में दोबारा धड़कने तक करीब तीन घंटे लगे। तन्मय की हालत बहुत गंभीर थी और वक्त पर इलाज न मिलता तो दूसरे अंग भी फेल होने का खतरा था।
ऑपरेशन के बाद तन्मय को आईसीयू में रखा गया, जहां सात दिन तक उस पर बारीकी से नजर रखी गई। हालत सुधरने पर दवाओं में जरूरी बदलाव किए गए। उसने धीरे-धीरे खाना खाना, चलना और रोज की हरकतें शुरू कर दीं। कार्डियक रिहैबिलिटेशन और फिजियोथेरेपी भी शुरू हो गई है। अब उसे आईसीयू से अस्पताल के जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया है।
तन्मय को अभी अस्पताल से छुट्टी नहीं मिली है। नया दिल शरीर कबूल कर रहा है या नहीं, यह देखने के लिए उसकी बायोप्सी की जाएगी और उसके मुताबिक दवाएं बदली जाएंगी। शरीर के दिल को नकारने का खतरा कम रखने के लिए उसे ताउम्र इम्यूनिटी काबू में रखने वाली दवाएं लेनी होंगी। नियमित जांच करानी होगी और इन्फेक्शन से बचाव की जरूरी सावधानी रखनी होगी। मेडिकल जरूरत के हिसाब से उसे कुछ वक्त दूसरों से अलग भी रखना पड़ सकता है।
तन्मय के पिता अशोक शिंदे बस ड्राइवर हैं और मां सुजाता गृहिणी हैं। परिवार की माली हालत कमजोर है, इसलिए महंगे इलाज का खर्च उठाना बड़ी चुनौती थी। इसके लिए फंड जुटाया गया और उसी से ट्रांसप्लांट के खर्च का इंतजाम हुआ।
तन्मय के माता-पिता ने बताया कि वह नवी मुंबई के कॉलेज में बारहवीं में पढ़ता था। बीमारी पकड़ में आने के बाद उसके लिए कॉलेज जाना भी मुश्किल हो गया और वह परीक्षा नहीं दे सका। उनके मुताबिक इस बीमारी से परिवार को बड़ा झटका लगा था और उन्हें उसकी सेहत और भविष्य की लगातार चिंता रहती थी। उन्होंने कहा कि बेटे को नई जिंदगी देने वाले डोनर के परिवार के वे दिल से शुक्रगुजार हैं। डॉ. बिस्वा पांडा और वाडिया अस्पताल की पूरी मेडिकल टीम का भी उन्होंने वक्त पर इलाज और देखभाल के लिए शुक्रिया अदा किया। उन्हें उम्मीद है कि तन्मय की सेहत अब सुधर रही है और अगले साल वह बारहवीं की परीक्षा देकर पढ़ाई फिर शुरू कर सकेगा।
बच्चों में अंगदान को लेकर जागरूकता की जरूरत बताते हुए डॉ. पांडा ने कहा कि बड़ों में हार्ट ट्रांसप्लांट का इलाज स्थापित हो चुका है, लेकिन बच्चों में यह अपेक्षाकृत कम होता है। बड़ी वजह सही डोनर के दिल की कमी है। गंभीर हृदय रोग वाले बच्चों को अपने शरीर के आकार और मेडिकल जरूरत से मेल खाता दिल मिलने तक वेटिंग लिस्ट में रहना पड़ सकता है। इसलिए बच्चों के अंगदान समेत अंगदान को लेकर व्यापक जागरूकता जरूरी है। उन्होंने कहा कि सही अंगदान से किसी बच्चे को नई जिंदगी और उसके परिवार को भविष्य की नई उम्मीद मिल सकती है।
वाडिया अस्पताल के हृदय फेल होने वाले बच्चों के खास इलाज केंद्र में इस वक्त करीब 300 बच्चों का इलाज और नियमित जांच हो रही है। अस्पताल बीमारी की वक्त पर पहचान, नियमित जांच और जरूरत के हिसाब से एडवांस इलाज पर खास जोर दे रहा है। ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले बच्चों को वक्त पर इलाज मिले, इसके लिए अस्पताल कोशिश में लगा है।
वाडिया बाल अस्पताल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. मिनी बोधनवाला ने कहा कि तन्मय का कामयाब हार्ट ट्रांसप्लांट अस्पताल के लिए अहम उपलब्धि है। बच्चों की पेचीदा बीमारियों के इलाज के लिए उनकी खास मेडिकल सेवाएं और सक्षम हो रही हैं। लिवर और किडनी ट्रांसप्लांट के बाद अब इसमें हार्ट ट्रांसप्लांट भी जुड़ गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे ऑपरेशन में सही डोनर का दिल पाने, उसे वक्त पर अस्पताल पहुंचाने और ट्रांसप्लांट के बाद मरीज की देखभाल, हर चरण में डॉक्टरों की टीम का बेहतरीन तालमेल जरूरी है। उन्हें उम्मीद है कि इस कामयाबी से अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ेगी और ट्रांसप्लांट के इंतजार में बैठे और बच्चों को नई जिंदगी जीने का मौका मिलेगा।
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