मनरेगा की जगह नया रोजगार कानून, वन अधिकार वाले परिवारों के 50 अतिरिक्त दिनों पर सवाल
केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह नया ग्रामीण रोजगार कानून लागू किया है, जिसमें 125 दिन के रोजगार की गारंटी है। वन क्षेत्र के कुछ आदिवासी परिवारों को मिले 50 अतिरिक्त दिनों को लेकर सवाल उठे हैं।
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गांवों में रहने वाले लोगों के लिए सरकारी रोजगार योजना कमाई का एक बड़ा सहारा है। पहले मनरेगा के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को हर साल 100 दिन के रोजगार की गारंटी मिलती थी। अब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह एक नया ग्रामीण रोजगार कानून लागू किया है, जो पात्र ग्रामीण परिवारों को हर साल 125 दिन के रोजगार की गारंटी देता है।
इसी बीच वन क्षेत्र में रहने वाले कुछ पात्र आदिवासी परिवारों को दिए गए 50 अतिरिक्त दिनों के रोजगार को लेकर सवाल उठाए गए हैं। सवाल यह है कि नए कानून के बाद भी क्या इन परिवारों को हर साल 150 दिन का रोजगार मिल सकेगा।
केंद्र सरकार ने 1 जुलाई 2026 से "विकास भारत-रोजगार और आजीविका अभियान अधिनियम, 2025" लागू किया है। इस अधिनियम के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक आर्थिक वर्ष में कम से कम 125 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है। मनरेगा में यह सीमा 100 दिन की थी, यानी नए कानून में गारंटी 25 दिन बढ़ गई है।
अब पुरानी व्यवस्था को देखें। जनवरी 2014 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वन क्षेत्र में रहने वाले कुछ पात्र अनुसूचित जनजाति परिवारों को मनरेगा के 100 दिनों के अलावा 50 दिन का अतिरिक्त मजदूरी रोजगार दिया जाए। यह सुविधा FRA यानी वन अधिकार कानून के तहत जमीन के हक पाने वाले परिवारों के लिए थी। शर्त यह थी कि इन परिवारों के पास वन अधिकार कानून के तहत मिली जमीन के अलावा अपनी कोई निजी जमीन न हो।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि नया कानून लागू होने के बाद भी पात्र वन अधिकार धारकों का इन अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार पर हक बनता है या नहीं। नए कानून की धारा 5 के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को 125 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है। लेकिन नए रोजगार कानून में अतिरिक्त 50 दिन के रोजगार का साफ जिक्र नहीं है।
यानी एक तरफ सभी पात्र ग्रामीण परिवारों के लिए गारंटी के दिन 100 से बढ़कर 125 हुए हैं, और दूसरी तरफ वन अधिकार वाले आदिवासी परिवारों को मिलने वाले अलग से 50 दिनों का भविष्य इस कानून में साफ नहीं लिखा गया है।