तस्करी का केस चल रहा, फिर भी कलबुर्गी के दंपति के पास ही रहेगा बच्चा: हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने राज्य सरकार की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। बच्चा कलबुर्गी के उसी दंपति के पास रहेगा।
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी दंपति पर बच्चे को खरीदने-बेचने और मानव तस्करी का केस चल रहा हो, तो सिर्फ इस वजह से बच्चे को उनसे दूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने आदेश दिया कि कर्नाटक के कलबुर्गी में रहने वाले इस दंपति के पास ही बच्चा रहेगा।
न्यायमूर्ति मेहरोज पठान ने राज्य सरकार की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि बच्चे को किसके साथ रहना चाहिए, यह तय करते समय केवल यह देखना काफी नहीं है कि उसके आसपास के लोगों पर मुकदमा दर्ज है। बच्चे का आगे का जीवन, उसकी मानसिक और भावनात्मक हालत, वह इस वक्त किस माहौल में है और उसकी परवरिश कैसी हो रही है, इन सब बातों को भी बराबर तौला जाना चाहिए। कोर्ट ने बच्चे की मौजूदा जिंदगी, दंपति से उसके लगाव और उसकी देखभाल को खास वजन दिया।
अब मामले की शुरुआत पर आते हैं। बच्चे का जन्म 6 सितंबर 2021 को नागपुर के मेडिकल अस्पताल में हुआ था। जन्म के दस दिन बाद, यानी 16 सितंबर 2021 को, बच्चे की जन्म देने वाली मां और इस दंपति के बीच गोद देने-लेने को लेकर नोटरी से प्रमाणित एक कागज तैयार किया गया था।
बाद में इस पूरे लेन-देन में पैसे का मामला उठा। आरोप है कि राजश्री नाम की एक महिला ने एक लाख रुपये देकर बच्चे को अपने कब्जे में लिया और फिर उसे इस दंपति के हाथ बेच दिया। बच्चे की कथित खरीद-फरोख्त की बात सामने आने पर पुलिस ने मानव तस्करी का केस दर्ज किया। जांच आगे बढ़ी तो जिस दंपति के पास बच्चा था, उसे भी आरोपी बना दिया गया।
मामला खुलने के बाद बाल कल्याण समिति की मदद से बच्चे को नागपुर के श्रद्धानंद अनाथालय में रखा गया। इसके बाद सवाल उठा कि बच्चा आखिर किसके पास रहे। यह कानूनी प्रक्रिया चली और बात अदालत की चौखट तक पहुंची।
सुनवाई के बाद सत्र न्यायालय ने 10 फरवरी 2023 को आदेश दिया कि बच्चा इसी दंपति को सौंप दिया जाए। राज्य सरकार को यह मंजूर नहीं था। उसने इस आदेश पर एतराज जताते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका लगाई। सरकार की दलील थी कि जिस दंपति पर मानव तस्करी जैसा संगीन केस चल रहा है, उसे बच्चे की कस्टडी देना कितना सही है।
हाईकोर्ट के सामने असल सवाल यही था कि जब बच्चे की कथित खरीद-फरोख्त का मुकदमा अदालत में लंबित है, तो क्या सिर्फ इसी आधार पर बच्चे को दंपति से अलग रखा जाए। खंडपीठ ने सभी पहलुओं को देखने के बाद माना कि कस्टडी का फैसला महज इस बात पर नहीं टिक सकता कि आपराधिक केस दर्ज है या अटका हुआ है। इसके लिए बच्चे का असली हित और उसके हालात भी परखने जरूरी हैं। इस सवाल पर कोर्ट ने सबसे ऊपर बच्चे की भलाई को रखा।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने खुद बच्चे से बात की। अदालत ने पाया कि बच्चा दंपति के साथ घुला-मिला है और खुश दिखता है। कोर्ट के सामने यह भी आया कि बच्चा इन दिनों कलबुर्गी के एक स्कूल में पढ़ने जा रहा है और दंपति उसका अच्छी तरह ख्याल रख रहा है।
कोर्ट ने बच्चे के दंपति से भावनात्मक रिश्ते, उसके पढ़ाई के मौजूदा माहौल और उसे मिल रही परवरिश को ध्यान में रखा। अदालत का कहना था कि ऐसे में इस मोड़ पर बच्चे को उसके मौजूदा माहौल से हटाना उसके हित में नहीं होगा। बच्चे की भावनात्मक सुरक्षा और ठहरी हुई जिंदगी को अहमियत देते हुए कोर्ट ने सत्र न्यायालय का पुराना आदेश कायम रखा। नतीजा यह कि फिलहाल बच्चा कलबुर्गी के दंपति के पास ही रहेगा।
हाईकोर्ट ने एक और बात साफ कर दी। बच्चे को सौंपने के सिलसिले में की गई टिप्पणियों और निष्कर्षों का दंपति के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, और उन्हें उस मुकदमे का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा। मानव तस्करी और कथित खरीद-फरोख्त के आरोपों पर आपराधिक अदालत अलग से सुनवाई करेगी और फैसला सबूतों व कानून के मुताबिक ही होगा।
दंपति की तरफ से अधिवक्ता अतुल पांडे ने अदालत में पैरवी की।
इस फैसले से यह संदेश निकलता है कि कस्टडी तय करते वक्त अदालत बच्चे के हित को सबसे आगे रखती है। गंभीर आपराधिक मामला लंबित हो, तब भी बच्चे की भावनात्मक सेहत, उसकी सुरक्षा और उसके मौजूदा रहन-सहन पर अलग से गौर करना जरूरी है।
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