लेबनान से लौटेंगे UN के शांति सैनिक, लगभग 641 भारतीय जवान भी वापस आएंगे
इस्रायल और लेबनान की ब्लू लाइन पर तैनात संयुक्त राष्ट्र के UNIFIL दल की वापसी का रास्ता खुल गया है। अमेरिका और इस्रायल ने इसके खिलाफ वीटो किया।
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इस्रायल और लेबनान के बीच बेहद संवेदनशील मानी जाने वाली 'ब्लू लाइन' सीमा पर कई दशकों से तैनात संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक अब वापस लौटने की राह पर हैं। लेबनान के राष्ट्रपति ने इस सैन्य दल को हटने से रोकने और मिशन को जारी रखने के लिए पूरी कोशिश की थी। लेकिन अमेरिका और इस्रायल ने इस फैसले के खिलाफ अपना वीटो इस्तेमाल किया, और लेबनान की सारी कोशिशें बेकार गईं।
इस घटनाक्रम के चलते दक्षिण लेबनान में लंबे समय से सेवा दे रहे करीब 641 भारतीय सैनिक भी जल्द भारत लौटेंगे। संयुक्त राष्ट्र के सबसे लंबे चलने वाले मिशनों में से एक 'यूनिफिल' (UNIFIL, यानी United Nations Interim Force in Lebanon) की वापसी से मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक समीकरण में बड़ा बदलाव दिख रहा है। संयुक्त राष्ट्र के इस दल की जगह आगे यूरोपीय देशों की सेना तैनात करने का एक नया प्रस्ताव विचाराधीन है।
इस अचानक वापसी से लेबनान के राजनीतिक हलकों और आम लोगों में काफी निराशा फैली है। वहीं इस्रायल के नजरिए से इसे बड़ी भू-राजनीतिक राहत माना जा रहा है। इस्रायल का हमेशा से यह एतराज रहा है कि यह शांति दल सीमा पर हिजबुल्ला की कार्रवाइयों को रोकने में नाकाम रहा।
पिछले 48 साल से ज्यादा समय से संयुक्त राष्ट्र के अंतरिम दल के सैनिक दक्षिण लेबनान के छोटे-बड़े गांवों और सीमावर्ती इलाकों में चौकीदार की तरह तैनात थे। इस दौरान उन्होंने 120 किलोमीटर लंबी 'ब्लू लाइन' पर शांति बनाए रखने की लगातार कोशिश की। 7 जून 2000 को संयुक्त राष्ट्र ने दक्षिण लेबनान से इस्रायली सेना की वापसी की जांच करने और सीमा इलाके में शांति रखने के लिए UNIFIL का यह दस्ता बनाया था।
इन सैनिकों का मुख्य काम सीमा की हलचल पर बारीक नजर रखना, संघर्षविराम के उल्लंघन दर्ज करना और उसकी पूरी जानकारी संयुक्त राष्ट्र को भेजना था। लेबनान के रिटायर्ड ब्रिगेडियर जनरल सईद कझाह के मुताबिक ये सैनिक सिर्फ 'दर्शक' की तरह काम करते थे और सीधे सैन्य संघर्ष में दखल नहीं दे सकते थे। फिर भी उनकी मौजूदगी से दोनों देशों के बीच तनाव एक हद में रहने में मदद मिलती थी।
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों को हटने से रोकने के लिए कूटनीतिक स्तर पर पूरी ताकत लगाई थी। मगर अमेरिका और इस्रायल ने मिशन के खिलाफ रुख अपनाते हुए प्रस्ताव पर वीटो कर दिया। अब राष्ट्रपति ने फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देशों के जरिए विकल्प के तौर पर यूरोपीय सेना तैनात करने के विचार का समर्थन किया है।
लेबनान की ओर से आरोप लगाया जाता है कि इस्रायल बार-बार उसकी संप्रभु सीमा में घुसपैठ करता है, और इसकी हर नोट ये अंतरराष्ट्रीय सैनिक रखते थे। अब जब यह दल ही जा रहा है, तो लेबनान की सुरक्षा व्यवस्था और अकेली पड़ जाने की आशंका जताई जा रही है।
भारत के लिए यह खबर अहम है कि दक्षिण लेबनान के पूर्व-दक्षिणपूर्वी हिस्से में इबेल साकी में तैनात 600 से 641 भारतीय जवानों की वापसी का रास्ता खुल गया है। भारत संयुक्त राष्ट्र के मिशनों में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले प्रमुख देशों में से एक है।
भारतीय सेना की यह टुकड़ी नवंबर 1998 से बेहद मुश्किल और खतरनाक हालात में लेबनान में सेवा दे रही है। इस दौरान इस्रायली सेना और हिजबुल्ला के बीच भीषण लड़ाई में कई बार भारतीय ठिकाने के पास बमबारी और हमले हुए, लेकिन भारतीय जवानों ने कभी हिम्मत नहीं छोड़ी और अपनी जगह पर डटे रहे। सीमा पर तनाव के बीच भी उन्होंने स्थानीय नागरिकों को समय-समय पर चिकित्सा मदद, अनाज और मानवीय सहायता पहुंचाई। अब मिशन खत्म होने से ये सभी भारतीय जवान जल्द सुरक्षित अपने देश लौटेंगे।