कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दिपके को जमानत, शांति बॉन्ड पर दस्तखत के बाद रिहाई
दिल्ली पुलिस के मुताबिक SEM कोर्ट ने दिपके की जमानत मंजूर की है।
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कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दिपके को जमानत मिल गई है। दिल्ली पुलिस ने यह जानकारी दी है। पुलिस के मुताबिक उनकी रिहाई जल्द होगी, लेकिन एक शर्त पूरी करने के बाद ही: उन्हें शांति बॉन्ड पर दस्तखत करने होंगे।
दिल्ली पुलिस ने बताया कि SEM कोर्ट ने दिपके की जमानत मंजूर की है। पुलिस के कहने के मुताबिक शांति बॉन्ड पर दस्तखत होते ही उन्हें छोड़ दिया जाएगा।
दिपके को पुलिस ने शुक्रवार को हिरासत में लिया था। दिल्ली में 'लेहरा दो तिरंगा' रैली रखी गई थी और पुलिस ने उन्हें इस रैली की अगुवाई करने से रोकने के लिए हिरासत में लिया। यह रैली नई दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके के सेंट्रल पार्क में होनी थी। सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदी लगाने के लिए प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधात्मक आदेश लागू किए थे।
इस हिरासत को CJP की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने चुनौती दी थी। उन्होंने मांग की थी कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत दिपके की फौरन रिहाई का आदेश दे। रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया पोस्ट में सवाल उठाया कि नागरिकों से शांतिपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने की अपील करना जुर्म कैसे हो सकता है। उनका कहना था कि दिपके ने सिर्फ तिरंगा फहराने की अपील की थी।
रत्ना सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि दिपके को उनके घर के बाहर से हिरासत में लिया गया, उनके ठिकाने की जानकारी वक्त पर नहीं दी गई और वकील भी उनसे नहीं मिल सके। उनके मुताबिक इससे मौलिक अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
यह सब ऐसे वक्त हुआ जब देश भर में आंदोलन चल रहे हैं। चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों के विरोध में ये आंदोलन हो रहे हैं। विपक्षी पार्टियां, INDIA गठबंधन के दल और छात्र संगठन भी इस मुद्दे पर आंदोलन कर रहे हैं।
दिल्ली पुलिस की जानकारी के मुताबिक निषेधात्मक आदेशों का उल्लंघन कर भीड़ जमा होने के मामले में करीब 150 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और कुछ FIR दर्ज की गई हैं। दिपके के खिलाफ BNSS की धारा 126 और 170 के तहत अलग से एहतियाती कार्रवाई भी की गई।
CJP ने पुलिस की कार्रवाई पर एतराज जताया है। हिरासत की कानूनी वैधता और उससे जुड़े आरोपों पर आखिरी नतीजा अदालती प्रक्रिया के बाद ही साफ होगा।